पितृपक्ष (श्राद्ध सेवा)

हमारे परम पूज्य पूर्वजों के श्री चरणों में समर्पित 🙏🙏
जिनके लाड़ प्यार व दुलार से सिंचित हुई जिंदगी की नींव हमारी,
जिनकी प्रार्थनाओं से सज संवर रही आज की ये शान व शौकत हमारी।
न्यौछावर उनके चरणों में
ये जीवन तपश्चर्या हमारी,
वैकुंठ बना ये मृत्युलोक ऐसी थी हस्ती तुम्हारी।। आप सभी पूर्वजों के श्री चरणों में समर्पित है ये भाव रूप रचना।
देना हर जन्म में साथ आशीषछत्र अपना,बस यही कामना करता आपका कृष्णमुरारी।। 

*ऋणी रहूंगा अपने पितरों का, जिन्होंने मुगलों के विरुद्ध ७०० और अंग्रेजों के विरुद्ध 190 वर्ष तक धर्मांतरण की लड़ाई लड़ी और मेरी पहचान हिंदू के रूप में रखी।

हे परम आदरणीय पूर्वजों !!! सात सौ साल के इस्लामिक राज और दो सौ साल के ईसाई शासन के बाद भी आज हम अपने त्योहार मना पाते हैं।

अपने देवी देवताओं की पूजा कर पाते हैं और अपने देश मे गर्व से रह पाते हैं, ये सब इसीलिए सम्भव हो पाया क्योंकि आपने तलवार के डर अथवा पैसों के मोह में अपना धर्म नहीं बदला

हम सदैव आपके ऋणी रहेंगे,  ये पितृपक्ष आपके अदम्य शौर्य और आपके निःस्वार्थ भक्ति को समर्पित 🙏🏼

श्राद्ध (पिंडदान) का क्या अर्थ है ? “श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्
श्रद्धा पूर्वक दिया या किया गया कार्य श्राद्ध है, प्राचीन भारतीय संस्कृति का अंग है, पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं तथा तृप्त करने की क्रिया और देवताओं,ऋषियों या पितरों को तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं, पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्षभर तक प्रसन्न रहते हैं, पिता की मृत्यु के बाद बाद आत्मा की तृप्ति और मुक्ति के लिए पुत्र द्वारा पिंडदान और तर्पण करने का विधान है।
शास्त्रों के अनुसार मनुष्य जीवन में तीन ऋण मुख्य हैं- ‘देव ऋण’, ‘ऋषि ऋण’, और ‘पितृ ऋण’।
पिंड तर्पण और श्राद्धकर्म के अभाव में जहां पूर्वजों की आत्मा को मोक्ष नहीं मिलता है,वहीं पुत्रों को भी पितृऋण से छुटकारा नहीं मिलता है। अतः पितृ ऋण का उतारा जाना जरूरी होता है क्योंकि जिन माता – पिता ने हमें जन्म दिया, हमारी उम्र, आरोग्य और सुख-समृद्धि के लिए कार्य और तकलीफें उठाईं उनके ऋण से मुक्त हुए बगैर हमारा जन्म निरर्थक है, पिंडदान और तर्पण को प्रत्येक हिन्दू – पुत्र को उसका कर्तव्य माना जाता है, शास्त्रों में पिंडदान के लिये पुत्र और पौत्रों का उल्लेख मिलता है।
अद्भुत रामायण में पुत्र की पुत्रता से जुड़ा यह श्लोक इस बात को स्वीकारता भी है-
जीवतो वाक्य करणात् क्षयाहे भूरि भोजनात्।
गयायां पिण्ड दानेन त्रिभि: पुत्रस्य पुत्रता।।
माता-पिता या अन्य पूर्वजों की निर्वाण तिथि पर गया में किया हुआ पिण्ड दान, ब्राह्मण भोजन और तर्पण करने से पुत्र को पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है।
इनमें से देव ऋण यज्ञादि द्वारा, ऋषि ऋण स्वाध्याय और पितृ ऋण को श्राद्ध द्वारा उतारा जाता है, देवकार्य की अपेक्षा पितृकार्य की विशेषता मानी गयी है, अतः देवकार्य से पूर्व पितरों को तृप्त करना चाहिये—
“देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते।
देवताभ्यो हि पूर्वं पितृणामाप्यायनं वरम्।।”
श्राद्ध को ‘महालय’ भी कहा जाता है,महालय शब्द का अर्थ भी घर में होने वाले उत्सव से ही है।
आश्विन मास के कृष्णपक्ष के पन्द्रह दिन पितृपक्ष के नाम से विख्यात हैं,इन पन्द्रह दिनो में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्यु तिथि पर श्राद्ध करते हैं,पितरों का ऋण श्राद्धों द्वारा चुकाया जाता है।
श्राद्ध में तीन वस्तुएँ अत्यन्त पवित्र है- दौहित्र(पुत्री का पुत्र) कुतपकाल तथा तिल(काले) और तीन वस्तुएँ अत्यन्त प्रशंसनीय हैं- बाहर – भीतर की शुद्धि, क्रोध न करना तथा जल्दबाज़ी न करना—
त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिला:।
त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम्।।
दिन के आठवे मुहूर्त में जब सूर्य का ताप घटने लगता है, उस समय को ‘कुतप’ कहते हैं, इस समय (कुतप) में पितरों के लिए किया श्राद्ध, दान आदि अक्षय होता है–
दिवसस्याष्टमे भागे मन्दी भवति भास्कर:।
स काल: कुतपो ज्ञेय: पितृणां दत्तमक्षयम् ।।
एक मुहूर्त अड़तालीस मिनट का होता है,मुहूर्त की गणना सूर्योदय से आरम्भ की जाती है।
पितृ पक्ष में प्रत्येक दिन कुतप काल होता है,यह समय दिन के 11 बजकर 36 मिनट से 12 बजकर 24 मिनट तक रहता है,इस अवधि में श्राद्ध कर्म करना उत्तम माना जाता है, कुतप काल को धर्म शास्त्रों में विशेष बताया गया है।
शास्त्रों में कहा गया है-.श्राद्ध करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्यादि की प्राप्ति करता है—
आयु: पुत्रान् यश: स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियं।
पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।।
पिंड का अर्थ है गोल और दान का अर्थ है किसी वस्तु का दूसरों को उपयोग के लिये दिया जाना।
पिण्ड का एक अर्थ शरीर भी है, यह एक पारंपरिक विश्वास है, जिसे विज्ञान भी मानता है कि हर पीढी के भीतर मातृकुल तथा पितृकुल दोनों में पहले की पीढियों के समन्वित ‘गुणसूत्र’ उपस्थित होते हैं,चावल के पिण्ड जो पिता, दादा, परदादा और पितामह के शरीरों का प्रतीक हैं, आपस में मिलकर फिर अलग बाँटते हैं, यह प्रतीकात्मक अनुष्ठान जिन जिन लोगों के गुणसूत्र श्राद्ध करने वाले की अपनी देह में हैं, उनकी तृप्ति के लिए होता है।
पिंडदान अपने पूर्वजों की मुक्ति हेतु किया जाने वाला दान है,इसमें आटे से बने गोल पिंड का दान किया जाता है इसलिए इसे पिंडदान कहा जाता है।
श्राद्धपक्ष में पिंड दान का काफी महत्व है,दक्षिण की तरफ मुख करके, जनेऊ को दाएं कंधे पर रखकर चावल, गाय के दूध, घी, शक्कर और शहद को मिलाकर तैयार किये गए पिंडों को श्रद्धा भाव के साथ अपने पितरों को अर्पित करना ही पिंडदान कहलाता है।
मनुष्य जिस अन्न को स्वयं भोजन करता है, उसी अन्न से पितर और देवता भी तृप्त होते हैं। पकाया हुआ अथवा बिना पकाया हुआ अन्न प्रदान करके पुत्र अपने पितरों को तृप्त करे—
“यदन्नं पुरुषोSश्नाति तदन्नं पितृदेवता।
अपक्वेनाथ पक्वेन त्रिप्तिं कुर्यात्सुतः पितु:।।’
पितृ पक्ष में जब सूर्य कन्या राशि में होता है,तब पितृ लोक से पृथ्वी पर पितर इस आशा के साथ आते हैं कि उनके पुत्र-पौत्र उन्हें पिंडदान कर संतुष्ट करेंगे।
ऐसा न होने पर अतृप्त इच्छा लेकर लौटे पितर दुष्ट या बुरी शक्तियों के अधीन हो जाते हैं, जिसके चलते बुरी शक्तियों द्वारा पितरों के माध्यम से परिवारजनों को कष्ट देने की आशंकाएं बढ़ जाती हैं।
पिंडदान या श्राद्ध कर्म करते हुए श्वेत वस्त्र ही पहनें,जौ के आटे या खोये से पिंड का निर्माण कर लें,फिर चावल, कच्चा सूत, फूल, चंदन, मिठाई, फल, अगरबत्ती, तिल, जौ, दही आदि से पिंड का पूजन करें,क्योंकि जब पितरों को आदर बुद्धि से और शास्त्र विधि के अनुसार पिण्ड – जल नहीं मिलता तब उनका अपने स्थानसे पतन हो जाता है—
“पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः”
मृतक के निमित्त अर्पित किए जाने वाले पदार्थ जैसे पके हुए चावल, दूध और तिल को मिश्रित करके जो पिण्ड बनाते हैं, उसे ‘सपिण्डीकरण’ कहते हैं।
इस पिण्ड को गाय-कौओं को देने से पहले पिण्डदान करने वाला सूँघता भी है,हमारे देश में सूंघना यानी कि आधा भोजन करना माना जाता है,इस प्रकार श्राद्ध करने वाला पिण्डदान से पहले अपने पितरों की उपस्थिति को ख़ुद अपने भीतर भी ग्रहण करता है।
श्राद्धकाल में आये हुए अतिथि का अवश्य सत्कार करे, उस समय अतिथि का सत्कार न करने से वह श्राद्धकर्म के सम्पूर्ण फल को नष्ट कर देता है—
तस्मादभ्यर्चयेत्प्राप्तं श्राद्धकालेऽतिथिं बुधः।
श्राद्धक्रियाफलं हन्ति नरेद्रापूजितोऽतिथिः।।
श्राद्ध में अपने भाई-बंधु, बहन, दामाद, बहन के पुत्र अर्थात भानजे को अवश्य ही सम्मिलित करना चाहिए। भाई-बंधु अथवा भानजा यदि मूर्ख भी हो तो उन्हें श्राद्ध से पृथक नहीं रखना चाहिए,भानजे का श्राद्ध में सम्मिलित होना पितरों के लिए प्रसन्नता एवं तृप्तिदायक हैं—
भागिनेयं विशेषेण तथा बन्धुगणानपि।
नातिक्रमेन्नरश्चैतान् मूर्खानपि च पद्मजे।।
बच्चों एवं सन्यासियों के लिए पिण्डदान नहीं किया जाता. पिण्डदान उन्हीं का होता है जिनको मैं-मेरे की आसक्ति होती है, बच्चों की मैं – मेरे की स्मृति और आसक्ति विकसित नहीं होती और सन्यास ले लेने पर शरीर को मैं मानने की स्मृति सन्यासी को हटा देनी होती है, शरीर में उनकी आसक्ति नहीं होती इसलिए उनके लिए पिण्डदान नहीं किया जाता।
श्राद्ध में बाह्य रूप से जो चावल का पिण्ड बनाया जाता, केवल बाह्य कर्मकाण्ड नहीं है वरन पिण्डदान के पीछे तात्त्विक ज्ञान भी छुपा है,जो शरीर में नहीं रहे हैं, पिण्ड में हैं, उनका भी नौ तत्त्वों का पिण्ड रहता है– चार अन्तःकरण और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ।
उनका स्थूल पिण्ड नहीं रहता है वरन वायुमय पिण्ड रहता है, वे अपनी आकृति दिखा सकते हैं किन्तु आप उन्हे छू नहीं सकते ,दूर से ही वे आपकी दी हुई चीज़ को भावनात्मक रूप से ग्रहण करते हैं, दूर से ही वे आपको प्रेरणा आदि देते हैं अथवा कोई कोई स्वप्न में भी मार्गदर्शन देते हैं।
पितरों के लिए पिण्डदान किया जाता है ताकि उनकी पिण्ड की आसक्ति छूटे और आगे की यात्रा हो,उन्हें दूसरा शरीर, दूसरा पिण्ड मिल सके,श्राद्ध के पिण्डों को गौ, ब्राह्मण या बकरी को खिला दे अथवा अग्नि या पानी में छोड दे।
श्राद्ध में तुलसीदल से पितृगण प्रसन्न होते हैं, ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णुलोक को चले जाते हैं, तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं।
मृत्यु के बाद जीवात्मा को उत्तम, मध्यम एवं कनिष्ठ कर्मानुसार स्वर्ग नरक में स्थान मिलता है,पाप – पुण्य क्षीण होने पर वह पुनः मृत्युलोक (पृथ्वी) में आता है स्वर्ग में जाना यह “पितृयान मार्ग” है एवं जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त होना यह “देवयान मार्ग” है,शुक्ल पक्ष को देवयान मार्ग और कृष्ण पक्ष को पितृयान मार्ग कहा है—
शुक्ल कृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते।
एकया यात्यनावृत्ति मन्ययावर्तते पुनः॥
जगत के ये दो प्रकार के- शुक्ल और कृष्ण अर्थात देवयान और पितृयान मार्ग सनातन माने गए हैं। इनमें एक द्वारा गया हुआ–जिससे वापस नहीं लौटना पड़ता, उस परमगति को प्राप्त होता हैअर्चि योगी और दूसरे के द्वारा गया हुआ, धूममार्ग से गया हुआ सकाम कर्मयोगी, फिर वापस आता है अर्थात जन्म-मृत्यु को प्राप्त होता है।
पितृयान मार्ग से जाने वाले जीव पितृलोक से होकर चन्द्रलोक में जाते हैं,चंद्रलोक में अमृतान्न का सेवन करके निर्वाह करते हैं, यह अमृतान्न कृष्ण पक्ष में चंद्र की कलाओं के साथ क्षीण होता रहता है,अतः कृष्ण पक्ष में वंशजों को उनके लिए आहार पहुँचाना चाहिए, इसीलिए श्राद्ध एवं पिण्डदान की व्यवस्था की गयी है।
हमारे जो सम्बन्धी देव हो गये हैं, जिनको दूसरा शरीर नहीं मिला है वे पितृलोक में अथवा इधर उधर विचरण करते हैं, उनके लिए पिण्डदान किया जाता है।
शास्त्रों में आता है कि अमावस्या के दिन तो श्राद्ध एवं पितृतर्पण अवश्य करना चाहिए।।

अत्यंत महत्त्वपूर्ण पितृपक्ष श्राद्ध सेवा में निषेध:-

*एकादशी के दिन पितृ देवो का श्राद्ध नहीं होता*    शास्त्र की आज्ञा है कि एकादशी के दिन श्राद्ध नहीं करना चाहिये। पुष्कर खंड में भगवान शंकर ने पार्वती जी को स्पष्ट रूप से कहा है ,जो एकादशी के दिन श्राद्ध करते हैं तो श्राद्ध को खाने वाला और श्राद्ध को खिलाने वाला और जिस के निमित्त वह श्राद्ध हो रहा है वह पितर, तीनों नर्क गामी होते हैं ।उसके लिए ठीक तो यही होगा कि वह उस दिन के निमित्त द्वादशी को श्राद्ध करें।
तो हमारे महापुरुषों का कहना है  कि अगर द्वादशी को श्राद्ध नहीं करें और एकादशी को करना चाहे तो पितरों का पूजन कर निर्धन ब्राह्मण को केवल फलाहार करावे ।भले ही वह ब्राह्मण एकादशी करता हो या ना करता हो। लेकिन हमें उस दिन उसे फलाहार ही करवाना चाहिए ।
*श्राद्ध में कभी स्त्री को श्राद्ध नहीं खिलाया जाता।* आजकल एक प्रचलन है पिताजी का श्राद्ध है तो पंडित जी को खिलाया और माता जी का श्राद्ध है तो ब्राह्मणी को खिलाया यह शास्त्र विरुद्ध है। स्त्री को श्राद्ध का भोजन करने की आज्ञा नहीं है ।क्योंकि वह जनेऊ धारण नहीं कर सकती, उनको अशुद्ध अवस्था आती है, वह संकल्प नहीं करा सकती, तो ब्राह्मण को ही श्राद्ध का भोजन कराना चाहिए ।ब्राह्मण के साथ ब्राह्मणी आ जाए उनकी पत्नी आ जाए साथ में बच्चे आ जाएं कोई हर्ज नहीं पर अकेली ब्राह्मणी को भोजन कराना शास्त्र विरुद्ध है।*पितरों को पहले थाली नहीं देवें,*
पित्तृ पूजन में पितरों को कभी सीधे थाली नहीं देनी चाहिए। वैष्णवो में पहले भोजन बनाकर पृथम ठाकुर जी को भोग लगाना चाहिए, और फिर वह प्रसाद  पितरों को देना चाहिए, कारण क्या है वैष्णव कभी भी अमनिया वस्तु किसी को नहीं देगा। भगवान का प्रसाद ही अर्पण करेगा और भगवान का प्रसाद पितरों को देने से उनको संतुष्टि होगी। इसलिए पितरों को प्रसाद अर्पण करना चाहिए ।
पित्तृ लोक का एक दिन मृत्यु लोक के 1 वर्ष के बराबर होता है ।यहां 1 वर्ष बीतता है पितृ लोक में 1 दिन बीतता  है ।
केवल श्राद्ध ही नहीं अपने पितरों के निमित्त श्री गीता पाठ, श्री विष्णु सहस्त्रनाम ,श्री महा मंत्र का जप ,और नाम स्मरण अवश्य करना चाहिए। पितृ कर्म करना यह हमारा दायित्व है ।जब तक यह पंच भौतिक देह है तब तक इस संबंध में जो शास्त्र आज्ञा और उपक्रम है उनका भी निर्वाह करना पड़ेगा ।
गया जी करने के बाद भी हमें श्राद्ध करना चाहिए। गयाजी का श्राद्ध एक विशिष्ट कर्म है, और प्रत्येक वर्ष की पित्तृ तिथि पर श्राद्ध यह हमारा नित्यकर्म है। इसलिए गया जी के बाद भी श्राद्ध कर्म करना गरुड़ पुराण अनुसार धर्म सम्मत है । यह सभी कर्म सनातन हिंदू धर्मावलंबियों के लिए हमारे ऋषियों ने निर्धारित किए हैं । इसकी विस्तृत व्याख्या है यहां केवल संक्षिप्त में  हम बता रहे हैं ।।
प्रत्येक धर्म में अपने पूर्वजों के लिए अलग-अलग प्रकार से सद्गति के लिए प्रक्रिया होती है । जिसका वे पालन करते हैं ।हम लोग केवल अपने सनातन धर्म की आज्ञा का ही पालन करते हैं। नास्तिक लोगों के लिए यहां पर कोई जगह नहीं है। क्योंकि यह कहा जाता है नास्तिक व्यक्ति भी मृत्यु के बाद में प्रेत योनि को ही प्राप्त होता है।
जय श्री राम ।
धन्यवाद ।

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