विजयादशमी उत्सव

विजयादशमी उत्सव

“शमी शमयते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी॥
करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया।
तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता॥”

अर्थात “हे शमी, आप पापों का क्षय करने वाले और दुश्मनों को पराजित करने वाले हैं। आप अर्जुन का धनुष धारण करने वाले हैं और श्री राम को प्रिय हैं। जिस तरह श्री राम ने आपकी पूजा की मैं भी करता हूँ। मेरी विजय के रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं से दूर कर के उसे सुखमय बना दीजिये।

शमी वृक्ष (अंग्रेज़ी:Prosopis cineraria) को हिन्दू धर्म में बड़ा ही पवित्र माना गया है। भारतीय परंपरा में ‘विजयादशमी’ पर शमी पूजन का पौराणिक महत्व रहा है। राजस्थान में शमी वृक्ष को ‘खेजड़ी’ के नाम से जाना जाता है। यह मूलतः रेगिस्तान में पाया जाने वाला वृक्ष है, जो थार मरुस्थल एवं अन्य स्थानों पर भी पाया जाता है।
विजयादशमी या दशहरे के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने की प्रथा है। मान्यता है कि यह भगवान श्री राम का प्रिय वृक्ष था और लंका पर आक्रमण से पहले उन्होंने शमी वृक्ष की पूजा करके उससे विजयी होने का आशीर्वाद प्राप्त किया था। आज भी कई स्थानों पर ‘रावण दहन’ के बाद घर लौटते समय शमी के पत्ते स्वर्ण के प्रतीक के रूप में एक दूसरे को बाँटने की प्रथा हैं, इसके साथ ही कार्यों में सफलता मिलने कि कामना की जाती है।
शमी वृक्ष का वर्णन महाभारत काल में भी मिलता है। अपने 12 वर्ष के वनवास के बाद एक साल के अज्ञातवास में पांडवों ने अपने सारे अस्त्र शस्त्र इसी पेड़ पर छुपाये थे, जिसमें अर्जुन का गांडीव धनुष भी था। कुरुक्षेत्र में कौरवों के साथ युद्ध के लिये जाने से पहले भी पांडवों ने शमी के वृक्ष की पूजा की थी और उससे शक्ति और विजय प्राप्ति की कामना की थी। तभी से यह माना जाने लगा है कि जो भी इस वृक्ष कि पूजा करता है उसे शक्ति और विजय प्राप्त होती है।

ऊन्नाव के शिव परमभक्त गुरु प्रसाद शुक्ल ने 1868 मे दशानन रावण का मंदिर बनवाया था… : यूपी के कानपुर में दशानन का इकलौता मंदिर है। दशानन मंदिर के कपाट साल में एक बार विजयदशमी के दिन सूर्य की पहली किरण के साथ खुलते हैं। रावण प्रकांड ज्ञानी था, उसके जैसा ज्ञानी इस पूरे ब्राह्ममांड में दूसरा नहीं था। दशानन रावण भगवान शंकर के चरणों में कमल के फूलों की तरह अपने शीश अर्पित करता था। विद्वानों का मानना है कि जिस दिन रावण का जन्म हुआ था, उसी दिन उसका वध भी हुआ था।
रावण की प्रतिमा को दूध और पानी से नहलाया जाता है। दशानन का श्रृंगार किया जाता है, और पूरे मंदिर को फूलों से सजाया जाता है। दशानन की पूरे विधी विधान से आरती की जाती है। रावण के दर्शन के लिए कानपुर ही नहीं आसपास के जिलों से भी आते हैं
इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालू दर्शन करने के लिए आते है, और पूजापाठ करते है।  विद्धानों का मानना है कि रावण प्रकांड ज्ञानी था, दशानन चारों वेदों का ज्ञाता था। उसके दर्शन मात्र से सकारात्मक-अलौकिक ऊर्जा का संचार होता है, बुद्धि और विवेक का विकास होता है।

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