!!वैशाख मास व्रत एवं माहात्म्य!!

*”न माधवसमो मासो न कृतेन युगं समम्। न च वेदसमं शास्त्रं न तीर्थं गंगया समम्।।” वैशाख के समान कोई मास नहीं है, सत्ययुग के समान कोई युग नहीं है,        वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है।    अपने कतिपय वैशिष्ट्य के कारण वैशाख उत्तम मास है।                                      एक कथा है कि नारद जी ने राजा अम्बरीष से कहा कि वैशाख मास को ब्रह्माजी ने सब मासों में उत्तम सिद्ध किया है। यह माता की भांति सब जीवों को सदा अभीष्ट वस्तु प्रदान करता है। धर्म, यज्ञ, क्रिया और तपस्या का सार है। यह मास संपूर्ण देवताओं द्वारा पूजित है। जैसे विद्याओं में वेद-विद्या, मंत्रों में प्रणव, वृक्षों में कल्पवृक्ष, धेनुओं में कामधेनु, देवताओं में विष्णु, वर्णों में ब्राह्मण, प्रिय वस्तुओं में प्राण, नदियों में गंगाजी, तेजों में सूर्य, अस्त्र-शस्त्रों में चक्र, धातुओं में स्वर्ण, वैष्णवों में शिव तथा रत्नों में कौस्तुभमणि उत्तम है, उसी प्रकार धर्म के साधनभूत महीनों में वैशाखमास सबसे उत्तम है। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला इसके समान दूसरा कोई मास नहीं है। जो वैशाखमास में सूर्योदय से पहले स्नान करता है, उससे भगवान विष्णु निरंतर प्रीति करते हैं। पाप तभी तक गर्जते हैं, जब तक मनुष्य वैशाख मास में प्रातःकाल जल में स्नान नहीं करता। राजन्! वैशाख के महीने में सब तीर्थ, देवता आदि (तीर्थ के अतिरिक्त) बाहर के जल में भी सदैव स्थित रहते हैं। भगवान विष्णु की आज्ञा से मनुष्यों का कल्याण करने के लिए वे सूर्योदय से लेकर छह दंड के भीतर वहां उपस्थित रहते हैं। वैशाख सर्वश्रेष्ठ मास है और शेषशायी भगवान विष्णु को सदा प्रिय है। जो पुण्य सब दानों से होता है और जो फल सब तीर्थों के दर्शन से मिलता है, उसी पुण्य और फल की प्राप्ति वैशाखमास में केवल जलदान करने से हो जाती है। जो जलदान में असमर्थ है, ऐसे ऐश्वर्य की अभिलाषा रखने वाले पुरुष को उचित है कि वह दूसरे को प्रबोध करे, दूसरे को जलदान का महत्व समझाए। यह सब दानों से बढ़कर हितकारी है।    जो मनुष्य वैशाख मास में मार्ग पर यात्रियों के लिए प्याऊ लगाता है, वह विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। नृपश्रेष्ठ ! प्रपादान (पौसला या प्याऊ) देवताओं, पितरों तथा ऋषियों को अत्यंत प्रिय है। जो प्याऊ लगाकर थके-मांदे पथिकों की प्यास बुझाता है, उस पर ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवतागण प्रसन्न होते हैं। राजन् ! वैशाख मास में जल की इच्छा रखने वाले को जल, छाया चाहने वाले को छाता और पंखे की इच्छा रखने वाले को पंखा देना चाहिए। राजेन्द्र ! जो पीड़ित महात्माओं को प्यार से शीतल जल प्रदान करता है, उसे उतनी ही मात्र से दस हजार राजसूय यज्ञों का फल प्राप्त होता है। धूप और परिश्रम से पीड़ित ब्राह्मण को जो पंखा डुलाकर शीतलता प्रदान करता है, वह निष्पाप होकर भगवान् का पार्षद हो जाता है। जो मार्ग में थके हुए श्रेष्ठ द्विज को वस्त्र से भी हवा करता है, वह भगवान विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लेता है। जो शुद्ध चित्त से ताड़ का पंखा देता है, उसके सारे पापों का शमन हो जाता है और वह ब्रह्मलोक को जाता है। जो विष्णुप्रिय वैशाखमास में पादुका दान करता है, वह विष्णुलोक को जाता है। जो मार्ग में अनाथों के ठहरने के लिए विश्रामशाला बनवाता है, उसके पुण्य-फलका वर्णन नहीं किया जा सकता।मध्याह्न में आए हुए ब्राह्मण अतिथि को यदि कोई भोजन दे तो उसे अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। वैशाख में तेल लगाना, दिन में सोना, कांस्यपात्र में भोजन करना, खाट पर सोना, घर में नहाना, निषिद्ध पदार्थ खाना दोबारा भोजन करना तथा रात में खाना – इन आठ बातों का त्याग करना चाहिए- तैलाभ्यघ्गं दिवास्वापं तथा वै कांस्यभोजनम्। खट्वानिद्रां गृहे स्नानं निषि(स्य च भक्षणम्।। वैशाखे वर्जयेदष्टौ द्विभुक्तं नक्तभोजनम्।। वैशाख में व्रत का पालन करने वाला जो पुरुष पद्म पत्ते पर भोजन करता है, वह सब पापों से मुक्त हो विष्णुलोक जाता है। जो विष्णुभक्त वैशाखमास में नदी-स्नान करता है, वह तीन जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है। जो सूर्योदय के समय किसी समुद्रगामिनी नदी में वैशाख-स्नान करता है, वह सात जन्मों के पापों से तत्काल मुक्त जाता है। सूर्यदेव के मेष राशि में आने पर भगवान विष्णु का वरदान प्राप्त करने के उद्देश्य से वैशाख मास-स्नान का व्रत लेना चाहिए। स्नान के अनंतर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए।                                       स्कंदपुराण में उल्लेख है कि महीरथ नामक एक विलासी और अजितेंद्रिय राजा वैशाख-स्नान मात्र से वैकुंठधाम को प्राप्त हुआ।  वैशाख मास के देवता भगवान मधुसूदन हैं। उनसे इस प्रकार की प्रार्थना करनी चाहिए- मधुसूदन देवेश वैशाखे मेषगे रवौ। प्रातःस्नानं करिष्यामि निर्विघ्नं कुरु माधव।। हे मधुसूदन ! हे देवेश्वर माधव ! मैं सूर्य के मेष राशि में स्थित होने पर वैशाख मास में प्रातः स्नान करूंगा, आप इसे निर्विघ्न पूर्ण कीजिए।’ तत्पश्चात् निम्न मंत्र से अघ्र्य प्रदान करें- वैशाखे मेषगे भानौ प्रातः स्नानपरायणः। अघ्र्यं तेऽहं प्रदास्यामि गृहाण मधुसूदन।। वैशाख मास में मनुष्य संकल्पादि कार्य में यदि पुष्परेणु तक का परित्याग करके गोदान करता है, तो उसे अपार सुख की प्राप्ति होती है। एक मास तक व्रत रखकर गोदान करने वाला इस भीमव्रत के प्रभाव से श्री हरिस्वरूप हो जाता है। यह मास अति उत्तम व पवित्र है। इसमें ऊपर वर्णित नियमों का पालन करने वाला व्यक्ति इहलोक के सुखों को भोग करता हुआ धर्म-अर्थ -काम-मोक्ष चारों पुरुषार्थों को भी प्राप्त कर लेता है। अतः सभी को वैशाख मास के सदाचार, नियमों और धर्मों का पालन करना चाहिए।* श्रीपरमात्मने नम:                        

!!वैशाख मास व्रत एवं माहात्म्य!!

        वैशाख मास महात्म्य           प्रथम अध्याय

सूत जी कहने लगे कि ब्रह्मा के पुत्र श्री नारद जी से राजा अम्ब्रीष ने पूछा कि ब्राह्मण !  मैंने सुना है कि वैशाख मास सब मास मे उत्तम है तो कृपया वैशाख मास का महत्व विस्तार पूर्वक मुझे सुनाइए | यह मास भगवान को क्यों अधिक प्यारा है ? इस मास में क्या दान करना चाहिए और उसका क्या फल है ? इस मास में कौन से कर्म करने योग्य हैं और उनको करने से कौन से देवता प्रसन्न होते हैं ? भगवान विष्णु को कौन से कार्य व कौन से दान प्रिय हैं और उनके फल व उद्देश्य भी कृपया विस्तार पूर्वक कहिए | भगवान का पूजन कैसे और किन वस्तुओं से करना चाहिए ?  नारद जी बोले, हे राजन् ! सब मासों का वृतांत भगवान ने लक्ष्मी जी से कहा और मुझे ब्रह्मा जी ने सुनाया था | यह महाविद्याओं में वेद विद्या,  मंत्रों में प्रणव,  वृक्षों में कल्पवृक्ष , गौओं में कामधेनु, नागों में शेष,पक्षियों में गरुड़,  देवों में विष्णु,  वर्णों में ब्राह्मण, प्रिय वस्तुओं में प्राण,  मित्रों में भार्या, नदियों में गंगा, तेजस्वीओ में सूर्य,  शस्त्रों में चक्र, धातुओं में सुवर्ण, वैष्णव में शिव, रत्नों में कौस्तुभ मणि के समान है | भगवान की भक्ति के लिए यह सबसे उत्तम है | मेष राशि की संक्रांति अर्थात वैशाख मास में जो सूर्योदय से पहले स्नान करता है उस पर भगवान लक्ष्मी सहित सदा प्रसन्न रहते हैं | वैशाख मास में स्नान करने वाले सब पापों से मुक्त होकर बैकुंठपुर आते हैं | इस मास में सूर्योदय से पहले जो एक बार भी स्नान करके या स्नान के निमित्त एक पग भी चलता है उसको कई एक अश्वमेध यज्ञों का फल मिलता है |  इस मास में नगर से बाहर थोड़े से जल में भी स्नान करने से यम आज्ञा से उनके पापों का फल नष्ट हो जाता है | विष्णु भगवान की आज्ञा से वैशाख मास में सूर्योदय से  छह घड़ी सब तीर्थों के अधिष्ठाता देवता जल के बाहर मनुष्यों के हित के लिए ठहरते हैं |  परंतु इस समय तक भी जो स्नान के लिए नहीं आते हैं उन को श्राप देकर फिर वह अपने धाम को चले जाते हैं| इसलिए वैशाख मास का स्नान अवश्य करना चाहिए |                            || ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

वैशाख मास महात्म्य
दूसरा अध्याय
नारद कहने लगे जैसे सतयुग जैसे युग, वेद समान शास्त्र, गंगा जी जैसा तीर्थ, जल दान जैसा दान , भार्या समान सुख, खेती के समान धन, जीवन के समान लाभ, नेत्रों के समान ज्योति, भोजन के समान तृप्ति, सत्य के समान यस, आरोग्य के समान हर्ष कोई दूसरा नहीं है, ऐसे ही वैशाख जैसा अन्य कोई दूसरा मास भगवान को प्यारा नहीं है | जो इस मास को वृथा गवा देते हैं, वह धर्महीन शीघ्र ही पशु योनि को पाते हैं | संसार में अनेक प्रकार के व्रत तपादी है जो अत्यंत कष्ट साध्य है और उनसे फिर जन्म लेना पड़ता है परंतु वैशाख मास में केवल नाम मात्र से मनुष्य मोक्ष को प्राप्त होता है | सब दानों तथा सब तीर्थों के स्नान का फल वैशाख में केवल जलदान से ही मिल जाता है | जिसमें जल दान देने की भी शक्ति न हो वह दूसरे से दाम दिलवाए उसका भी वही फल होता है | जो पथिकों के लिए प्याऊ लगाता है वह अपने कई कुलों का उद्धार करता है | प्याऊ लगाने से देवता, पितर तथा ऋषि अत्यंत प्रसन्नता को प्राप्त होते हैं | जो जल की इच्छा हो तो जलदान, जो पवन की इच्छा हो तो पंखा वैशाख मास में दान दें जो प्यासे को जल् पिलाता है वह राज सूर्य यज्ञ का फल प्राप्त करता है | जो धूप और पसीने से व्याकुल ब्राह्मण की पंखे से हवा करता है वह सब पापों से रहित हो गरुड़ के समान हो जाता है और ब्राह्मण को पंखा दान न करने वाला अनेक प्रकार के वात आदि रोगों से दुखित हो नर्क मे निवास करता है | जो थके हुए ब्राह्मण पर कपड़े से ही हवा करता है वह पापहीन होकर भगवान की सायुज्य मुक्ति पाता है और जो सुद्ध ह्रदय से ताड़ का पंखा दान करता है वह सब पापों से मुक्त होकर वैकुण्ठ जाते हैं |जो इस मास में खड़ाऊ दान करते हैं वह यमदूत का तिरस्कार करते हुए वैकुंठ को पाते हैं | जूते दान कर आने वाले को ना इस संसार में दुख होता है और ना ही नरक यातना भोगनी पड़ती है | ब्राह्मण के याचना करने पर खड़ाऊ का दान करने वाला राजा होता है | जो मार्ग में यात्रियों के लिए घर बनाता है उसका फल ब्रह्मा भी वर्णन नहीं कर सकते | जो अतिथि ब्राह्मण को भोजन करावे उसके फल का भी कोई विस्तार नहीं | अन दान पाने वाला अपने माता पिता को भी भूल कर दानी ही को अपना सर्वस्व मानता है | माता-पिता तो केवल जन्म के दाता है इसलिए विद्वान लोग अन् देने वाले को ही पिता कहते हैं ।।                  .                                                           || ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

वैशाख मास महात्म्य
तीसरा अध्याय
जो मनुष्य वैशाख मास में ब्राह्मणों को सुंदर चारपाई का दान करता है और उस पर सोए हुए ब्राह्मण को हवा करता है तो संपूर्ण धर्मों के साधन से उसका शरीर निरोग रहता है | वह योगियों से भी दुर्लभ मुख्य पद को पाता है | उसके पाप ऐसे ही जल जाते हैं जैसे अग्नि के स्पर्श से कपूर | उस पलंग पर ब्राह्मण के सोने से जीवन के जाने व अनजाने पाप नष्ट हो जाते हैं | वह इस जन्म में सुखों को भोक्ता है, उसके कुल की भी वृद्धि होती है, यश और धैर्य मिलता है| उसके कुल में कोई अधर्मी नहीं होता है | वह संसार के सुखों को भोग कर अपने प्राण त्याग कर बैकुंठ को जाता है | जो वैशाख मास में ब्राह्मण को सुंदर तकिया दान करता है उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं , बिना उसके सुखपूर्वक सो नहीं सकता और पृथ्वी का राज भोगता हुआ सात जन्मो तक सुखी, धर्मपरायण तथा विजय रहकर अपने सात कुलों सहित मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। जो वैशाख मास में चटाई या आसन दान करता है, जैसे जल में पड़ी हुई वह भीगती नहीं जल से अलग रहती है वैसे ही वह मनुष्य संसार के सब धर्मों से अलग रहता है। चटाई तथा आसन देने वाला पुरुष आसन और शैया पर बैठकर सुख भोगता है। जो पुष्प और कुमकुम का दान करता है वह सार्वभौम राजा होता है। जो जल से भीगी हुई चंपा तथा कुश का दान करता है वह सब पापों से दूर होकर सर्व सुख देवताओं से सहाय किया जाकर मोक्ष को प्राप्त होता है जो। मेष संक्रांति में केतकी और मल्लिका का दान करता है वह भगवान की आज्ञा से मुक्त पद प्राप्त करता है। जो सुपारी, सुगंधित द्रव्य तथा नारियल का दान करता है वह सात जन्म तक ब्राह्मण के घर जन्म लेकर शास्त्रों सहित विष्णु लोक को प्राप्त होता है। जो ब्राह्मण के विश्राम के लिए मंडप बनाकर देता है उसको अनंत फल होता है। जो छाया मंडप बनवाकर बालू गिरवा कर प्याऊ लगाता है वह स्वर्ग का भी स्वामी होता है। जो रास्ते में बाग , तालाब , कुआ , बावड़ी प्याऊ आदि लगाता है मनो धर्म उसका पुत्र ही है। उत्तम शास्त्रों को सुनना, तीर्थ यात्रा, सत्संग, अन्नदान, पीपल का वृक्ष लगाना यह पुत्र समान ही है, ऐसी संतान देवताओं को भी दुर्लभ है। जिनके संतान ना हो उनको इनमें से एक काम अवश्य करना चाहिए।।
|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

वैशाख मास महात्म्य
-:चौथा अध्याय:-
नारद जी कहते हैं कि वैशाख मास में शरीर में तेल लगाना, दिन में सोना , कांसे के बर्तन में भोजन करना , दुबारा भोजन करना , खाट पर सोना , घर में स्नान करना यह सब कार्य वर्जित है। वैशाख मास में दोपहर के समय थके हुए ब्राह्मण के पैर दबाना सब व्रतों में उत्तम है। जो दोपहर में आए हुए थके ब्राह्मण को सुंदर आसन देखकर उसके पैर दबाता है उसे गंगादि सब तीर्थों के स्नान का फल मिलता है। वैशाख मास में जो स्नान नहीं करता और कमल पत्र पर भोजन नहीं करता वह पहले गधे की योनि को प्राप्त होकर, खच्चर की योनि को प्राप्त होता है। मनुष्य रोगहीन और मोटा ताजा होकर भी वैशाख मास में स्नान न करने से चांडाल योनि को प्राप्त होता है। वैशाख मास की संक्रांति के दिन जो बाहर जाकर किसी तीर्थ पर स्नान नहीं करता वह सौ जन्म तक कुत्ते का जन्म लेता है। वैशाख मास में अनदान, जलदान ना करने से निश्चय पूर्वक सभी दुखों से मुक्ति नहीं मिलती। वैशाख मास में नदी में स्नान करके भगवान विष्णु का ध्यान करने से निश्चय ही तीन जन्मों में किए हुए पाप नष्ट हो जाते हैं। प्रातः काल समुद्र में गिरने वाली नदियों में स्नान करने से सात जन्मों के पाप और उषाकाल में सप्तगंगा में स्नान करने से करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। जानवी, वृद्धगंगा ,कालिंदी, सरस्वती, कावेरी, नर्मदा और त्रिवेणी यह सप्त गंगा है। वैशाख मास में बहते हुए जल में मज्जन करने से सारे जन्म के किए हुए पाप नाश हो जाते हैं। वैशाख मास में बावड़ी आदि के थोड़े से जल में भी स्नान करने से बड़े बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं। वहां पर गंगादि सब तीर्थों का निवास होता है। दूध से उत्तम दही, दही से उत्तम है घी, वैसे ही सब मासों में कार्तिक, कार्तिक से माघ और माघ से वैशाख मास उत्तम है। दरिद्री पराधीन को जो भी थोड़ी से थोड़ी वस्तु ,जल, कंद मूल, फल, गुड, छाछ आदि मिल जाए वही दान करना चाहिए। दान न करने से दरिद्रता आती है और दरिद्रता से मनुष्य पाप करता है , उसे नरक मिलता है इसलिए मनुष्य को सामर्थ्य अनुसार अवश्य दान करना चाहिए। यदि कोई मकान बहुत बड़ा हो परंतु उस पर छत न हो तो वह शोभा को प्राप्त नहीं होता इसी प्रकार वैशाख मास में दान के बिना मनुष्य व्यर्थ है। वैशाख मास के देवता विष्णु है इस कारण इस मास में किया हुआ जप, दान, यज्ञ और तप अधिक फल देने वाले हैं। नीचे लिखे मंत्र से भगवान की प्रार्थना करें “हे भगवान मैं वैशाख मास की संक्रांति में स्नान करने की कामना करता हूं कृपया आप इसको पूर्ण करें तथा हे मधुसूदन ! मैं स्नान करके आपको अर्घ्य देता हूं आप इसे ग्रहण करें। गंगा आदि सब तीर्थ मेरे अर्घ्य को ग्रहण करके मुझ पर प्रसन्न हो। आप समदर्शी ,पापियों पर भी कृपा करने वाले, मेरे अर्घ्य को ग्रहण करें और यथोचित धन दे।” इस प्रकार अर्घ्य देकर स्नान कर वस्त्र पहन अपना नित्य नियम करें और वैशाख में उत्पन्न होने वाले फूलों से भगवान का पूजन करें तथा वैशाख की कथा सुने ,इससे करोड़ों जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं। जो तुलसी दल से भगवान विष्णु का पूजन करता है वह सार्वभौम राजा होकर अनेक जन्मों तक विविध सुखों को भोगता है और फिर अपने कितने ही फूलों के साथ विष्णु का सायुज्य मुक्ति पाता है।।                                    || ॐ नमो भगवते वासुदेवाय||

वैशाख मास महात्म्य
पांचवा अध्याय
नारद जी कहने लगे हे राजा वैसाख सब धर्मों , तत्वों और मासों में श्रेष्ठ है। यह मैं तुमसे कहता हूं कि जब युग समाप्त हो जाते हैं तथा प्रलय काल में भगवान अनेक से एक होकर सब जीवो को अपने उदर में समेटकर समुद्र में शयन करते हैं तब इस प्रकार काल के बीतने पर वेद भगवान को जगाते हैं और भगवान अपने उदर में स्थित जीवो की रक्षा करते है तथा उन्हें अपने अपने कर्मों का फल देने के लिए सृष्टि के रचने का विचार करते हैं। तो उनकी नाभि से त्रिलोकी का आधार रूप में सुवर्णकमल उत्पन्न होता है। उस कमल मे विराट रूप ब्रह्मा उत्पन्न हुए फिर सत, रज और तम उत्पन्न हुए और गुण , प्रकृति, मर्यादा तथा भुवनों के स्वामी रचे। फिर वर्णाश्रम के विभाग पर धर्म की कल्पना करते हुए वेद मंत्र, स्मृति , पुराण और इतिहास रच कर इसके प्रवर्तक ऋषि उत्पन्न किए।अलग-अलग वर्णों के धर्म निर्माण किए। प्रजा अपने धर्म में यथोचित लगी हुई है या नहीं यह देखने के लिए साक्षात अंतर्यामी भगवान डर दिखाने और परीक्षा के निमित्त अवतार धारण कर इस संसार में आए। वर्षा काल में कई कीचड़ में फस कर यथोक्त धर्म कार्य नहीं कर सकते, शीत में वातादि से दुखी होकर ठीक धर्म पर नहीं चल सकते , शरद ऋतु में ठंड के मारे प्रातः काल नहीं उठते हैं इससे बड़ा दुख होता है। इस कारण भगवान ने संपूर्ण पापों के निवारण के लिए बसंत ऋतु बनाई है। यह ऋतु स्नान ,दान, यज्ञ क्रिया और सब लोगों के लिए अनुकूल है। मीन संक्रांति में वर्णाश्रम वासियों के घरों में रहकर भगवान लोगों के कर्मों को देखते हैं। धर्म पर चलने वाले मनुष्यों की मनोकामना पूरी करते हैं और अधर्म पर चलने वाले की आयु क्षिण करते हैं। जो वैशाख मास में अच्छी तरह भगवान का पूजन करते हैं अर्थात उन्हीं के रूप साधु महात्माओं की सेवा करते हैं तथा जो अन्य महीनों में नहीं करते किंतु वैशाख मास में ही करते हैं उनकी पूजा आदि को देखकर भगवान उनको क्षमा करते हैं। जैसे कोई राजा अपनी प्रजा को देखने के लिए अपने राज्य में जाता है और प्रजा यथाशक्ति कुछ भेंट लेकर अपने राजा के समीप जाती है तब राजा उसी से यह अनुमान लगा लेता है कि उक्त प्रजा में कौन कितना राज्य भक्त है। उसी तरह भगवान भी पूजा से यह देखते हैं कि कितनी श्रद्धा है। भगवान इस मास में सब प्राणियों की परीक्षा करते हैं।।
|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

वैशाख मास महात्म्य
छठा अध्याय

पतित पावन एकादशी दर्शन

नारद जी कहते हैं कि हम एक ब्राह्मण और छिपकली का इतिहास कहते हैं। प्राचीन काल में हेमांग नाम वाला एक राजा इक्ष्वाकु वंश में हुआ था। वह ब्राह्मणों का बड़ा भक्त , किसी की निंदा न करने वाला , शत्रु पर विजय पाने वाला तथा जितेंद्रिय था। उसने इतने यज्ञ किए कि कुशाओं से पृथ्वी पर कुशा ही कुशा दिखाई देने लगी। उसने गांव, भूमि तथा स्वर्ण का दान देकर अनेक ब्राह्मणों को प्रसन्न किया। कोई ऐसा दान नहीं था जो उसने ना किया हो। परंतु उसने कभी वैशाख मास में जल दान नहीं किया। वह कहता था कि और अलभ्य वस्तु दान करने का फल है, जल तो सच में ही लभ्य है। अतः वह राजा लूले, लंगड़े, अंधे और जीविका हीन ब्राह्मणों की सेवा किया करता था किंतु वेदपाठी ,तत्वज्ञान और ब्रह्मवादियों की पूजा नहीं किया करता था। वह कहता था कि विख्यात ब्राह्मणों की सेवा तो सब करते हैं लेकिन अनपढ़, लूले, लंगड़े और दलितों की दुर्गति है और यही दया के पात्र हैं। इस दोष के कारण उसे तीन जन्म तक चातक की योनि मिली, फिर एक जन्म में गिद्ध बना। फिर सात जन्म तक कुत्ते की योनि मिली फिर एक जन्म में जन्म में राजा के महल में छिपकली की योनि में उत्पन्न हुआ। इस प्रकार राजा को मिथिलापुरी के राजा के घर में छिपकली बनकर द्वार की चौखट पर कीड़ों को भक्षण करते हुए 87 वर्ष बीत गए। एक समय श्रुतदेव ऋषि भूखे प्यासे दोपहर के समय मार्ग में थके हुए मिथिला पति के घर आए। उसी को देख राजा ने खड़े होकर उनका बड़ा आदर सत्कार किया और मधुपर्क आदि करके उनका पूजन किया और उनके चरण धोकर अपने माथे पर उस जल को छिड़का। उस जल की एक बूँद उस छिपकली पर जा गिरी और दैवयोग से उस जल की एक बूंद पढ़ते ही उसको अनेक योनियों के जन्म का ज्ञान हो गया और हाय हाय कहकर कहने लगा कि हे ब्राह्मण ! मेरी रक्षा करो रक्षा करो। छिपकली के ऐसे वचन सुनकर ब्राह्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ और कहने लगे कि वह कौन है और क्यों इतना विलाप करता है। तू अपना सब वृतांत कह तभी तेरा उद्धार करूंगा। ऋषि के ऐसे वचन सुनकर वह छिपकली कहने लगी कि ब्राह्मण ! मैं इक्ष्वाकु कुल में उत्पन्न हुआ। मैं वेद शास्त्रों का ज्ञाता था। मैंने अनेको औगऊदान और यज्ञ किए तथा बहुत से तालाब और बावड़ी बनवाई , अनेकों दान भी कीये और धर्म पूर्वक राज्य भी किया तो भी मुझे स्वर्ग नहीं मिला। तीन जन्म तक चातक और एक जन्म में गिद्ध हुआ था , सात जन्म तक कुत्ते की योनि में रहा और अब इस छिपकली की योनि में हूं। यह राजा आपका चरणोंदक छिड़क रहा था तो उसकी एक बूंद गिर गई जिससे मुझे पूर्व जन्मों का वृतांत स्मरण हो आया है और मेरे अनेकों पाप नाश हो गए
मुझे २८ जन्म तक छिपकली की योनि भुगतनी पड़ेगी सो मैं इन जन्मों से डरता हूं। अब आप कृपा करके कहिये कि मेरी यह दशा कैसे हुई ? ऋषि ने अपने ज्ञान चक्षु द्वारा सब कुछ जान लिया और कहने लगे कि मैं तुम्हारी बुरी योनि का कारण जानता हूं ,तुम ध्यान देकर सुनो। तुम ने भगवान के प्यारे वैशाख मास में कभी जलदान नहीं किया। तुमने जल सुलभ जान यह समझ लिया कि यह तो बिना मूल्य ही मिलता है और धूप व मार्ग के प्यासे ब्राह्मणों को जल दान नहीं दिया। महात्माओं की अवज्ञा इस लोक और परलोक दोनों में दुखदाई है। सज्जन की पूजा ही धर्म, अर्थ , काम और मोक्ष देने वाली है। इस प्रकार बहुत से कर्तव्या कर्तव्य को नहीं देखते जैसे मंद आदमियों की संगति से कुछ फल नहीं मिलता वैसे ही तीर्थ और मूर्तियों से भी तत्काल कुछ फल नहीं मिलता ,परंतु महात्मा तो दर्शन मात्र से ही पवित्र कर देते हैं। तुमने न तो जल दान दिया ना साधु की सेवा की , इसी कारण तेरी यह दुर्गति हुई है। अब मैंने जो वैशाख में पुण्य किया है वह तेरे को दूंगा उसी के फल से तेरी शांति होगी। इससे तेरे भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों के कर्मों के संस्कार दूर हो जाएंगे। यह कह ऋषि ने जल स्पर्श कर एक दिन के वैशाख स्नान का फल उसको दे दिया। जल के छींटे लगते हैं वह सब पापों से मुक्त होकर दिव्य रूप हो , छिपकली का रूप त्याग कर, ऋषि के आगे हाथ जोड़कर परिक्रमा करके, नमस्कार और आज्ञा लेकर स्वर्ग को चला गया और 10000 वर्षों तक सुंदर भोगों को भोग कर इक्ष्वाकु वंश में ही बड़ा प्रभावशाली ककुत्थ्य नाम से उत्पन्न हुआ और सात द्वीप पृथ्वी का राज्य करने लगा।।
|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

वैशाख मास महात्म्य

सातवां अध्याय
                      नारद जी कहने लगे कि मिथिलापुरी का राजा यह अद्भुत चरित्र देखकर ऋषि  के आगे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और कहने लगा कि महात्मन इस धर्म को विस्तार पूर्वक सुनने की मेरी इच्छा है जिससे यह इक्ष्वाकु वंश का राजा मोक्ष को प्राप्त हुआ।  श्रुतिदेव  कहने लगे कि तुम धन्य हो जो युवावस्था में ही तुमको भगवान के धर्म के लिए इतना प्रेम है।  बहुत जन्मों  से संचित कर्मों के बिना प्राणी की बुद्धि भगवान की कथा आदि में नहीं लगती।   इस युवावस्था में इतना बड़ा राज्य पाकर तुम्हारी ऐसी मति को देखकर मैं तुमको श्रेष्ठ वैष्णव मानता हूं इसलिए मैं यह श्रेष्ठ वैष्णव धर्म तुमसे कहता हूं जिसके  श्रवण मात्र से प्राणी जन्म – मरण के बंधन से छूट जाता है।  जैसे प्रत्येक मनुष्य के लिए शौच , स्नान , संध्या, तर्पण आदि नित्य नियम कर्म है वैसे ही वैशाख मास के भी कुछ कर्म है।   वैशाख धार्मों  के समान और कोई धर्म नहीं है।   जो कोई इन धर्मों को नहीं करता उसको स्वर्ग प्राप्त नहीं होता।   जैसे बिना राजा की प्रजा उपद्रवों से नष्ट हो जाती है वैसे ही बहुत से धर्म भी नष्ट हो जाते हैं।  वैशाख मास के धर्म  जैसे जल का घड़ा देना, प्याऊ  लगाना, मार्ग में छाया करना, जूता ,खड़ाऊ, छतरी तथा पंखे का दान करना , श्रम को दूर करने वाले गोरस  का दान, बावड़ी कुआ  तालाब तथा धर्मशाला आदी  बनवाना, नारियल, ईख , कपूर और कस्तूरी आदि दान करना, चन्दन आदि सुगंधित द्रव्य, शैया खाट , आम और दूसरे फल,  पुष्प, सायं काल समय शरबत , पूर्णिमा के दिन सब तरह के अन्न  पान का दान करना। चैत्र  की अमावस्या को करील  का दान करना।   सूर्योदय से पहले प्रतिदिन स्नान करना,  भगवान का पूजन करना तथा कथा सुनना,  मार्ग के थके हुए को  पंखों से हवा करना।  कोमल  पुष्पों से भगवान का पूजन करना,  भगवान को भोग लगाना, गऊओं को घास डालना , ब्राह्मणों के चरण धोना , गुड़ सोंठ आंवले  का दान , यात्रियों की सेवा, शाक  दान यह सब धर्म वैशाख मास में अत्युत्तम बतलाए हैं।  जो स्त्री वैशाख मास में भगवान का पूजन फूलों से नहीं करती उसको पुत्र का सुख नहीं होता , उसका पति और आयु भी नष्ट हो जाते हैं।   इस मास में भगवान लक्ष्मीविष्णु अपने पार्षदों के साथ इस पृथ्वी पर लोगों के घर-घर जाकर उनकी परीक्षा करते हैं।   जो इन दिनों उनका पूजन नहीं करता वह रोरव आदि नर्क में पड़ता है और फिर 5 बार राक्षस योनि को जाता है।   इसलिए इस मास में अन्न और जल से भूखे प्यासे प्राणियों की अवश्य रक्षा करें।।
|| ॐ  नमो भगवते वासुदेवाय ||

वैशाख मास महात्म्य    : –    आठवां अध्याय

अन्नदान ना करने का इतिहास मैं तुमसे कहता हूं। रेवा नदी के किनारे मेरे पिता पिशाच हो गए थे। वह भूख और प्यास से अपना ही मांस खाते थे। छाया वाले वृक्ष के ना मिलने से उनकी दशा बहुत बुरी हो रही थी। पहले जन्मों के संचित बुरे कर्मों से उनकी स्वास की नली का छीद्र बहुत सूक्ष्म हो गया था जिससे उनको बड़ी पीड़ा होती थी। कुएं, बावड़ी और तालाब का जल उनको विष के समान लगता था। मैं गंगा यात्रा को जा रहा था उस समय रेवा नदी के किनारे पहुंचा तो मैंने यह अद्भुत दृश्य देखा कि हालमलि के वृक्ष के नीचे बैठा हुआ एक पिशाच अपना ही मांस खा रहा है। भूख और प्यास के मारे बुरी तरह चिल्ला रहा है। वह मुझे देखते ही मारने को दौड़ा लेकिन परन्तु मेरे तेज के सामने वह हताश हो गया। मुझको उस पर दया आई और मैंने उससे कहा कि डरने का कोई कारण नहीं है, तुम कौन हो अपना सब वृतांत कहो, मैं तुमको शीघ्र ही इस दुख से छुड़ा दूंगा। वह नहीं जानता था कि मैं उसका पुत्र हूं। वह कहने लगा कि आनर्त देश में भुवराखत नामक एक नगर था उसमें मैं संस्कृत गोत्र में उत्पन्न हुआ और मैत्र मेरा नाम था। तप दान और यज्ञ में मेरी बड़ी श्रद्धा थी, मैंने संपूर्ण विद्या पढ़ी और पढ़ाई परंतु मैंने वैसाख में कभी अन्नदान नहीं किया। मेरे विचार में इसी कारण मुझको यह पिशाच योनि मिली और कोई कारण दिखाई नहीं देता।। मेरा पुत्र श्रुतदेव नामक बड़ा विद्वान और धर्मात्मा है तुम उससे जाकर कह देना कि तुम्हारा पिता बैसाख में दान न करने के कारण पिसाच योनि में पड़ा हुआ रेवा नदी के किनारे बैठा हुआ अपना ही मांस खा रहा है। यह बात मैंने तुमसे कही है यदि तुम मेरे पुत्र से जाकर कहोगे तो बड़ी कृपा होगी। मैं अपने पिता की यह बात सुनकर दुख के कारण रोता हुआ उनके पैरों में पड़ गया और कहने लगा कि पिता जी ! मैं तुम्हारा पुत्र हूं दैवयोग से यहां आ गया हूँ आप मुझको आज्ञा दीजिए मैं वही कार्य करूंगा जिससे आपका यह दुख दूर हो। तब वह बड़ी प्रसन्नता के साथ कहने लगे की यात्रा करके शीघ्र घर जाओ और मेष संक्रांति में स्नान आदि करके भगवान विष्णु के निमित्त अनादि किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान दो जिससे मेरी मुक्ति हो जाएगी। मैंने तीर्थ यात्रा करके वैशाख मास में अन्न दान किया तब मेरे पिता पिशाच योनि से मुक्त हो मुझ को आशीर्वाद देते हुए विमान में बैठकर बैकुण्ठ लोक को गए। मैंने तुमसे धर्म का सार भूत कहा अब तुम्हारी क्या सुनने की इच्छा है ?       .      ||ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||.       

                       वैशाख मास महात्म्य

नौवां अध्याय
इतनी सुनकर मिथिलेश ने पूछा कि – हे ब्राह्मण ! इक्ष्वाकु वंश के राजा ने जल और अन्न का दान नहीं किया इसी से वह चातक और छिपकली की तथा साधु महात्माओं की सेवा ना करने से गिद्ध योनि में आया परंतु आपने बतलाया कि वह सात जन्म तक कुत्ते की योनि में आया, तो  इसका कारण मेरी समझ में नहीं आया।   उसने संत महात्मा को कष्ट नहीं दिया ना ही वह कृपण था।  उसने केवल संत महात्माओं की सेवा नहीं की तो उसको फल नहीं मिला, उसने किसी को कष्ट भी नहीं दिया तो बिना कारण ही उसको कुत्ते की योनि क्यों मिली इसका मुझको संशय है, कृपया करके आप मेरी शंका का समाधान करिए।   राजा के ऐसे प्रश्नों को सुनकर महायशस्वी श्रुतिदेव ने कहा —- तुम को धन्य है जो हे राजन ! तुमने ऐसा धार्मिक प्रश्न किया तो मैं अब इसका समाधान करता हूं।   यही वार्ता शिव जी ने कैलाश पर्वत पर श्री पार्वती जी से कही थी।   सब लोकों  की रचना कर उनकी परलोक और लोक  दो प्रकार की स्थिति बनाई और इनकी स्थिति के निमित्त तीन  तीन  भेद बनाएं।   जल सेवा अन्न  सेवा और औषधि सेवा।  यह तीनों  इस लोक के  हेतु हैं तथा  साधु सेवा, विष्णु पूजा और धर्म यह तीनों पारलौकिक स्तिथि  के हेतु है जैसे ऐहिक कर्म से धन संपत्ति प्राप्त हो सकते हैं वैसे ही पारलौकिक क्रियाएं कभी-कभी दुख का कारण भी हो जाती है।  जैसे यहां पर एक पुराना इतिहास कहते हैं – एक  समय दक्ष प्रजापति महादेव जी को यज्ञ में बुलाने के लिए कैलाश में गए , तब उनको आए देखकर श्री महादेव जी खड़े नहीं हुए क्योंकि शिवजी ने सोचा कि मैं सनातन हूं और यह सब देवता यज्ञ का भाग लेने वाले सेवक के समान है इसलिए स्वामी का सेवक के आने पर ,  पति का पत्नी के आने पर, गुरु का शिष्य के आने पर उठना आवश्यक नहीं। यह सब शास्त्रों का मत  है।  जिसमें बल, दान और शांति अधिक रहती है वही गुरु है जो।   स्वामी स्वयं अपने सेवकों के लिए उठते हैं उनकी आयु, धन और यश तत्काल नष्ट हो जाते हैं इसलिए यह मेरा प्रिय ससुर  है ऐसा विचार कर दक्ष प्रजापति की भलाई के लिए ही उठे नहीं।   यह देखकर दक्ष प्रजापति को अत्यंत क्रोध आ  गया और उनके सामने हैं उनकी  निंदा करने लगा –  कि देखो इस दरिद्री को बड़ा अहंकार हो गया है इसका धन केवल एक बूढ़ा बैल जिस पर केवल चर्म ही रह गया, कपाल की हड्डी धारण करता है,  पाखंडी अहंकारी, महा  अपवित्र किसी का शुभ कार्य न करने वाला, दरिद्रता के मारे शीत  से दुखित, हाथी के  चर्म को ओढ़नेवाला ,  श्मशान  जिसका घर है, सर्पों का आभूषण है,  ना इसमें धीरज है, न  ज्ञान,  भस्मासुर से डर के मारे दूर भाग गया, भूत प्रेत आदि का संघ, इसके  कुल का कुछ पता नहीं।   दुरात्मा नारद ने वृथा ही इसकी बढ़ाई की जिससे मैंने अपनी कन्या सती का विवाह इसके साथ कर दिया।  इसको अपने घर में सुख से निवास कराए  ऐसा भी नहीं हो सकता।  जैसे कुंभार का घड़ा चांडाल के घर में पहुंचने से किसी काम का नहीं रहता वैसे यह मेरी कन्या, मुझसे कोई प्रयोजन नहीं।   इस प्रकार दक्ष प्रजापति शंकर सती को यज्ञ का निमंत्रण ना देकर और कुवाक्य कहकर चला गया और यज्ञ स्थान में ऋत्विक और मुनियों को  साथ लेकर विधिपूर्वक यज्ञ करने लगा।  इस यज्ञ में ब्रह्मा और विष्णु नहीं आए परंतु सिद्ध ,चारण, गंधर्व, राक्षस, किन्नर  और सब देवता यज्ञ में आये। सती को यह लालसा उत्पन्न हुई कि किसी प्रकार यज्ञ का उत्सव देखे  और अपने संबंधियों से मिले।   महादेव जी के रोकने पर भी वह ना  मानी  और जाने का निश्चय कर लिया।   शिवजी ने कहा कि भद्रे ! दक्ष सदैव सभा में बैठकर मेरी निंदा करता है वह तुमसे सहन ना हो सकेगा  और तुम अवश्य अपना शरीर त्याग ददोगी  एवं तुम अपने पिता के घर मत जाओ इसमें कल्याण नहीं है।   इस प्रकार समझाने पर भी सती  न मानी और चुपचाप चल दी तब पीछे जाकर नंदी ने उसको अपनी पीठ पर बिठा लिया और कितने ही भूत प्रेताधिक उनके संग हो गए।   जब वह महल में पहुंची तो किसी ने भी उनके साथ कोई बात नहीं की, तब शिव जी की बात याद करके वह यज्ञशाला हमें गई वहां पर सभा के लोग सती  से कुछ भी ना बोले सती चुपचाप वहां खड़ी रही और रुद्र की आहुति तक पिता की चेष्टा देखती रही।  जब दक्ष  ने रूद्र  की आहुति नहीं दी तब सती ने क्रोधित होकर कहा कि जो बड़ों का अपमान करते हैं उनका कल्याण नहीं होता।  तुमने सारे जगत के रचयिता अविनाशी रूद्र को आहुति नहीं दी। यहां जितने ऋषि मुनि महात्मा एकत्रित हुए हैं उन्होंने भी तुमको सुबुद्धि नहीं दी , ऐसा प्रतीत होता है कि विधाता तुम्हारे साथ इनके भी प्रतिकूल है।  जब सती  वचन कह रही थी तो पूषा देवता मुंह फाड़ कर हंसने लगे और कर्महीन  शुक्राचार्य दाढ़ी और मूंछ फड़काने लगा, दक्ष निंदा करने लगा।   यह सब देखकर सती को अत्यंत क्रोध आ गया और वह पति की निंदा सुनकर प्रायश्चित के रूप में सबके देखते-देखते हवन कुंड में कूद पड़ी।  सती के गिरते ही हाहाकार मच गया। शिव के सारे गण  शिव जी के पास आए और सारी कथा सुनाई महादेव ने कालांतर रूप हो क्रोध में अपनी जटा  उखाड़कर पृथ्वी में दे मारी जिससे बड़ा बलवान महाकाय वीरभद्र उत्पन्न हुआ और हाथ जोड़कर कहने लगा कि जिस काम के लिए आपने मुझको उत्पन्न किया है वह  बतलाइए।  तब शिवजी ने उसको आज्ञा दी कि मेरे निंदक दक्ष का नाश कर दो ,जिसके कारण शती  को शरीर त्यागना पड़ा।   महादेव जी की आज्ञा पाकर सहस्त्र भुजाओं वाला और यमराज के सदृश वीरभद्र यज्ञशाला में पहुंचा और देवता, असुर, मनुष्य आदि जो भी यज्ञ में उपस्थित थे तब को मारने लगा।  पूषा दाँत   निकालकर हँसा था इसलिए उसके दांत उखाड़ दिए, भृगु  की दाढ़ी मूछ उखाड़ दी,  जिसने जो अंग फड़काया था वीरभद्र ने  है उसका वही अंग उखाड़  कर फेंक दिया।   दक्ष का सिर काटने लगा किन्तु शुक्राचार्य मंत्र बल से  उसकी रक्षा कर रहे थे इसलिए नहीं काट  सका तब रूद्र ने स्वयं उसका शरीर काट डाला।  इस प्रकार यज्ञ में आए हुए सबका संहार  कर वे  कैलाश को लौटे।  जो मरने से बचे थे वह सब भागकर ब्रह्मा जी की शरण में गए, ब्रह्मा जी उनको साथ लेकर कैलाश में गए और वहां जाकर अनेक प्रकार से समझा-बुझाकर श्री शिवजी को शांत कराया फिर महादेव जी को साथ लेकर यज्ञशाला में पहुंचे यज्ञ में जो मारे गए थे उनको जीवनदान दिया और महादेव जी ने दक्ष के धड़  पर बकरे का सिर रख दिया , जिससे आज तक उनके उपास उनकी प्रशंसा के लिए बं बं  बं  करते हैं। भृगु जी के मुख पर  बकरे की दाढ़ी लगा दी, पूषा  के दांत नहीं लगाए उनसे कह दिया कि वह पीसकर खालिया करेगा।  इस प्रकार सबको अंग सहित किया गया और दक्ष  पूर्वरत यज्ञ करने लगा।  यज्ञ संपूर्ण होने पर सब देवता अपने अपने स्थान को चले गए।।

|| ॐ  नमो भगवते वासुदेवाय||

वैसाख मास महातम्य

दसवां अध्याय

श्री शिवाजी महाराज ने ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर लिया। गंगा तट पर एक वृक्ष के नीचे तप करने लगे। दक्ष की पुत्री पतिव्रता सती ने राजा हिमाचल के घर उसकी स्त्री मेनका के गर्भ से पार्वती के रूप में जन्म लिया तथा वहीं पर उनका पालन पोषण होने लगा। इसी समय तारकासुर नाम का एक राक्षस उत्पन्न हुआ, जिसने महातप करके ब्रह्मा को प्रसन्न किया और ब्रह्मा जी से यह वरदान पा लिया कि वह देवता, राक्षस, नाग व मनुष्य किसी से नहीं मरेगा,  किसी प्रकार के आयुध अस्त्र-शस्त्र से नहीं मरेगा, परन्तु किसी रुद्र भगवान के पुत्र से तेरी मृत्यु होगी। राक्षस ने सोचा कि जब शिव के स्त्री ही नहीं तो पुत्र कहां से होगा फिर मृत्यु ही कैसे हो सकेगी इस कारण कह दिया कि तथास्तु। ऐसा वर पाकर तारकासुर ने सबको दुःख देना आरम्भ कर दिया। देवताओं को अपना दास बना लिया और देवांगनाओं को दासी। इस प्रकार जब देवता अत्यन्त दुःखी हो गए तो वे ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। ब्रह्मा जी ने उनके दुःख को सुनकर कहा कि वर देते समय हमने उस राक्षस को कहा था कि उसकी मृत्यु शिव के पुत्र के हाथ से है, अतः सिवाय रुद्र के पुत्र के उसकी मृत्यु और किसी उपाय से नही होगी। इसलिये ऐसा उपाय करना चाहिये कि शिव की स्त्री सती ने दक्ष के यज्ञ में अपने प्राण दिये थे,  अब उसने पार्वती के रूप में हिमाचल के घर जन्म लिया है। परन्तु रुद्र भगवान हिमाचल के शिखर पर घोर तप कर रहे हैं सो ऐसा उपाय करना चाहिए, जिससे रुद्र का पार्वती के साथ पाणिग्रहण हो जाए। तब सभी देवताओं ने इन्द्र सहित अमरावती पुरी में जाकर गुरु बृहस्पति जी से सलाह ली और फिर इन्द्र ने अपने कार्य की सिद्धि के लिए नारद तथा कामदेव को बुलाया और उनसे कहा कि वह हिमाचल के घर जाकर उनको समझायें कि पहले जन्म में दक्ष की पुत्री श्री शिवजी की पत्नी अब पार्वती के रूप में तुम्हारी पुत्री हुई है सती के वियोग में श्री महादेव जी तुम्हारे शिखर पर तप कर रहे हैं। इसलिए तुम अपनी कन्या का विवाह उनसे कर दो, जिससे वह जाकर उनकी सेवा कर सकें, वही उसके पति होंगे। इन्द्र की आज्ञा पाकर नारद जी को जैसा समझाया था वैसा ही करने के लिए चले गये और फिर इन्द्र ने कामदेव को बुलाया कि सब देवताओं के हित के लिए तुम बसंत ऋतु के सहित तपोवन में जहाँ रुद्र तपस्या कर रहे हैं जाओ और वहाँ पर बसंत का विस्तार करो और जब पार्वती जी वहाँ पहुँच जायें तब धनुष चढ़ाकर ऐसा बाण मारो कि शिवजी मोहित हो जायें। उनका संगम होने पर सब कार्य अवश्य पूरे हो जायेंगे। कामदेव ने ऐसी आज्ञा पाकर रती को साथ लेकर तपोवन में बसंत ऋतु का प्रसार किया। उस समय श्री महादेव जी के पास उनकी सेवा करने के लिए पार्वती जी बैठी हुई थीं, कि तभी कामदेव ने पीछे की तरफ से वृक्ष की ओट में होकर शिव को बाण मारा तो शिवजी का मन चलायमान हो गया। कामदेव दूसरा बाण चलाने वाला ही था शिव को यह विचार उत्पन्न हुआ कि उनके मन का चंचल होने का क्या कारण है। और जब उन्होंने चारों तरफ देखा तो कामदेव दिखाई दिया। क्रोध से अपने मस्तक से तीसरा नेत्र खोला तो उसमें से ऐसी अग्नि उत्पन्न हुई जिससे सारा संसार भयभीत हो गया और उस अग्नि से धनुष सहित कामदेव भस्म हो गया। सब देवता अपने कार्य की सिद्धि समझ कर इधर-उधर गये । तथ पार्वती जी भी एक ओर डर कर दूर जा खड़ी हुईं। तब स्त्री की निकटता दूर करने के लिए महादेवजी भी अन्तर्धान हो गये। हित की सिद्धि करने वाले देवताओं का कार्य सफल न हुआ किन्तु उल्टा अनर्थ हुआ। जो कोई साधुओं से दुष्टता करता है उसके साथ ऐसा ही है। इसी से इक्ष्वाकु वंश का राजा भी साधुओं को अप्रिय था क्योंकि वह भली भाँति साधुओं की सेवा नहीं किया करता था, इसलिए उसने महान दुःख भोगे और बुरी से बुरी योनि में जन्म लिया इसी प्रकार कामदेव ने शिवजी का अप्रिय से दुःख उठाये ।।

।।ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।।

वैसाख मास महातम्य

ग्यारहवां अध्याय

राजा मैथिल ने पूछा कि जब कामदेव हि भस्म हो गया फिर उसकी उत्पत्ति कैसे हुई? का श्रुतदेव कहने लगे कि यह कथा स्वामी कार्तिक तः के जन्म की है जो यश और पुण्य देने वाली है। जब महादेव जी ने कामदेव को जला दिया तो ले उसकी स्त्री रती अपने पति को भस्म हुआ। देखकर शोक से मूर्छित हो गई जब दो घड़ी हुआ पश्चात् उसकी मूर्छा गई तो अत्यन्त विलाप करने लगी, जिससे सारा तपोवन दुःखमय हो गया। अब रति ने चिता में जलकर शरीर त्याग देने का विचार किया और पति के मित्र बसंत में को पति की अन्तिम क्रिया करने को बुलाया जब तक वह चिता बना ही रही थी कि बसंत भी आ गया। वह रति को देख अति दुखित हो रति को समझाने लगो और कहने लगा कि आत्मघात करना उचित नहीं तथा धर्म से विपरीत है। जब बसंत ने उसके शरीर त्यागने का विचार दृढ़ देखा तो नदी के किनारे चिता बनाई और रति गंगा में स्नान कर सब इन्द्रियों को रोक और मन को आत्मा में लीन करके चिता चढ़ने को तैयार हो गई तो उसी समय आकाशवाणी हुई कि हे पतिप्रेमा! तुम चिता द में प्रवेश मत करो, तुम्हारा पति महादेव जी न और कृष्ण भगवान से उत्पन्न होगा। इस प्रकार त क्रम से दो जन्म होंगे तब दूसरे जन्म में श्रीकृष्ण अ से रुक्मिणी के गर्भ से प्रद्युम्न रूप में उत्पन्न व होगा। तू ब्रह्मा के श्राप से शंबर नामक राक्षस च के घर में निवास करेगी। वहीं तेरा पति प्रद्युम्न मे तुमको प्राप्त होगा। इतना कह कर आकाशवाणी अ समाप्त हो गई और जब रति ने आकाशवाणी के सुनी तो उसने चिता में प्रवेश नहीं किया फि दि जिनके कार्य की सिद्धि के लिए श्री शिवजी ने कि कामदेव को भस्म कर दिया था उन सब देवताओं ने बृहस्पति, इन्द्र और अग्नि को आगे करके रति को वरदान दिया कि आज से तेरा पति अनंग कहलायेगा और अंग-वाले की तरह र मरा हुआ भी दिखाई देगा। और फिर कहने क लगे पूर्वकाल में तेरा पति सुन्दर नाम का राजा था उस जन्म में भी तुम इसकी पत्नी थीं परन्तु न्य रजसंकर कारिणी होने के कारण तुम्हारी यह दशा हुई। अब बैशाख मास में मन्दाकिनी नामक नदी में स्नान करके मधुसूदन भगवान का पूजन तथा उनकी दिव्य कथा सुनने से तुम्हारा पति अवश्य तुमको मिल जाएगा। रति को इस प्रकार वरदान देकर सब देवता अपने अपने स्थान को न चले गये और रति ने भी क्लेश से निवृत होकर मेष की संक्रान्ति में गंगा स्नान कर पवित्रता से अक्षुण्ण शयन व्रत को धारण किया। इस व्रत के करने से उसका उसी समय कामदेव दिखाई दिया। उसने बैशाख मास में कर्तव्य धर्म नहीं किया था इसी कारण परमात्मा का पुत्र होने पर भी अंगहीन हुआ। श्रुतदेव कहने लगे कि जब महादेव पार्वती जी के सन्मुख खड़े हुए। अन्तर्धान हो गये तो पार्वती जी खड़ी रह गई और सोचने लगीं कि अब क्या किया जाये तब उनके पिता हिमाचल उन्हें अपने घर ले गये। परन्तु पार्वती श्री शिवजी के गुणों पर इतनी मुग्ध हो गईं कि उन्होंने अपने मन में यही ठान लिया कि श्री शिवजी ही मेरे पति होंगे और वह अपने माता-पिता के समझाने पर भी कुछ विचार कर श्री शिवजी की मूर्ति को अपने मन में धारण करके गंगा तट पर जाकर घोर तप करने लगीं। भोजन आदि छोड़कर तप करते करते बड़ी-बड़ी जटाएँ उनके सिर पर हो गईं। इस प्रकार हजार वर्ष तक शिवजी की आराधना करती रहीं। एक दिन सायँकाल के समय श्री महादेव जी पार्वती जी की परीक्षा करने के लिए ब्रह्मचारी वेष धारण कर उनकी पर्णकुटी में आकर उनकी अचल भक्ति देखकर कहने लगे कि हे भद्रे! जो तुम्हारे मन में हो वरदान मांगो। तब पार्वती जी कहने लगीं कि मैं यही वरदान मांगती हूँ कि आप मेरे पति हों। तथास्तु कहकर श्री शिव जी ने सप्त ऋषियों को बुलाया और उपस्थित होने पर उन्हें आज्ञा दी कि तुम हिमाचल के पास जाकर विवाह का प्रस्ताव करो। सातों ब्रह्मवादी ऋषि चारों तरफ प्रकाश करते हुए आकाश मार्ग से हिमाचल के घर पहुँचे। राजा ने उनका यथोचित पूजन आदि से सत्कार किया। तब ऋषियों ने कहा कि हे राजा हिमाचल! तेरी कन्या पार्वती पहिले दक्ष की कन्या सती थी जिसने अपने पिता के यज्ञ कुण्ड में गिरकर अपने प्राण त्याग दिये थे। इनका पाणिग्रहण करने के योग्य सिवाय शिव के और कोई नहीं है, इसलिए तुम अपनी कन्या का विवाह श्री शिवजी के साथ कर दो। तब हिमाचल ने कहा कि मेरी कन्या ने तो छाल के वस्त्र पहिन कर गंगा तट पर शिवजी के साथ विवाह करने के लिए अनशन व्रत धारण किया हुआ है सो उसकी मनोकामना पूर्ण हुई। आप महादेव जी को जाकर कह दें कि मैं प्रीति पूर्वक अपनी कन्या उनके अर्पण कर चुका, आप उसको अंगीकार कीजिए। उधर सप्तऋषि श्री महादेव जी के पास पहुँचे और विवाह निश्चित तिथि पर लक्ष्मी आदि सब देवियों और विष्णु आदि सब देवताओं के समक्ष विवाह हुआ। जब शिवजी पार्वती के संग नित्य रमण करते रहे परन्तु गर्भ स्थिति न हुई तो देवताओं को अति चिन्ता हुई और सब इसके कारण को सोचने लगे। फिर विचार कर अग्नि देव को बुलाया और उसको समझाया कि जिस समय महादेव जी रमण कर चुकें तो तुम उनके सामने चले जाना। पार्वती तुमको देखकर लज्जा के मारे वहां से हट जायेंगी और तुम शिवजी को अपनी बातों में लगा लेना और शिष्य समान बहुत से प्रश्न करना तथा समय लग जाने पर पार्वती जी की गर्भ स्थिति हो जायेगी। अग्नि देव ने ऐसा ही किया और रमण के समय वहां पहुँच जाने से पार्वती वस्त्रहीन होने के कारण लज्जा के मारे रमण छोड़ एक तरफ हो गईं। शिवजी महाराज को ऐसे समय अग्नि देव का आना बहुत बुरा लगा और उन्होंने श्राप दिया कि मेरा वीर्य तुम्हारे मुख द्वार से तुम्हारे उदर में ग्रहण कर लिया और दस महीने बीत जाने पर उस तेज वीर्य को गंगा जी में डाल दिया। गंगा जी भी उसको सहन न कर सकीं और उसको सरकंडों में फेंक दिया और वहाँ पर उसके छः भाग हो गये। तब ब्रह्मा जी ने छः कृत्याओं को भेजा, उन्होंने उन छहों भाग को जोड़ा। जिससे छः मुख और एक अंग ऐसी आकृति का बालक बन गया । वह बहुत दिनों तक उन सरकंडों में ही पड़ा रहा। एक दिन श्री महादेव जी और पार्वती जी बैल पर चढ़े जा रहे थे कि सहसा पार्वती के स्तनों से दुग्ध की धारा बहने लगी। तब पार्वती जी ने श्री महादेव जी से इसका कारण पूछा तो श्री महादेव जी बोले हे देवी! मैं इसका कारण कहता हूँ। देखो यह पास में ही तुम्हारा पुत्र पड़ा हुआ है और फिर महादेव जी ने पिछली सारी कथा पार्वती जी को सुनाई और कहा कि उसी को देखकर तुम्हारे स्तनों में दूध आ गया है क्योंकि वह तुम्हारा पुत्र है । महादेव जी की यह बात सुनकर पार्वती जी ने उस बालक को उठा लिया तथा अपनी गोदी में बिठाकर उसको अपने स्तनों से दूध पिलाने लगीं। इस प्रकार पार्वती जी पुत्र स्नेह से मुग्धा होकर उसको कैलाश में ले गईं और उसक पालन पोषण करने लगीं। श्रुतदेव कहने लगे कि राजन् यह कुमार के जन्म की कथा मैंन तुमसे कही।।

|| ॐ  नमो भगवते वासुदेवाय||.      

,🍁वैसाख मास महातम्य🍁.          🌹 बारहवां अध्याय🌹

मैथिली कहने लगे कि ब्रह्मन् आपने कामदेव की स्त्री रति का वर्णन किया और उसकी अक्षुण्ण शयन व्रत धारण करने की कथा भी मैंने सुनी। अब कृपा करके यह बतलाइये कि इस व्रत की विधि क्या है? यह वार्ता सुनकर श्रुतिदेव कहने लगे कि इसका विधान पहले श्री हरि ने लक्ष्मण जी से कहा था, वह सब मैं तुमको सुनाता हूँ। इस व्रत के करने से श्री लक्ष्मीपति भगवान प्रसन्न हो जाते हैं। इस पापनाशक व्रत को किये बिना जो धर्म में प्रवेश करते हैं उनका सब कर्म निष्फल हो जाता है । श्रावण शुक्ला द्वितीया को इस व्रत को धारण करना चाहिए। चातुर्मास्य में हविष्यान्न भोजन करना चाहिए तथा श्री लक्ष्मी नारायण का पूजन करें। चातुर्मास्य व्यतीत होने पर विधिवत् इसका पालन करना चाहिए। किसी ब्राह्मण को जूते दो। सोने या चाँदी की मनोहर मूर्ति बनावे, पीताम्बर से उसको शोभायमान करे। सफेद पुष्प और सुगन्धित द्रव्यों से उसका पूजन करे। फिर ब्राह्मणों को शय्या दान, वस्त्र दान करके भोजन करावे। ब्राह्मण और ब्राह्मणी दोनों को संग भोजन कराके दक्षिणा दे। इस प्रकार चार मास तक पूजन करे। मार्गशीर्षादि मासों में भी विधिवत् उसी तरह का भगवान का पूजन करे। ऐसे ही चैत्र से चार मास तक हरि भगवान का पूजन करे। जिनको सनकादि ऋषिगण पूजते हैं उन भगवान की स्तुति करे और इस व्रत को आषाढ़ शुक्ला द्वितीया क समाप्त कर देवे। ओम नमो नारायण’ इस मन्त्र से हवन करे। चैत्रादि मास में ‘पुरुष सूक्त’ से हवन करे। मार्गशीर्षादि मास में विष्णु गायत्री ॐ नारायणाम विद्महे’ इस मन्त्र से हवन करे श्रुतिदेव कहते हैं कि हे राजन! यह व्रत मैंने तुमसे विस्तार पूर्वक कहा। इसको करने से जगन्नाथ भगवान प्रसन्न होते हैं और उनकी प्रसन्नता से अनेक सुख तथा संतान की वृद्धि होती है ।।             .                                                          || ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||.                                  

वैसाख मास महातम्य

तेरहवां अध्याय

यह कथा सुनकर राजा ने श्रुतिदेव से प्रश्न किया कि हे ब्रह्मन्! बैशाख में छत्र दान करने का क्या महात्म्य है, कृपा करके विस्तार पूर्वक बताइये। राजा के इस प्रश्न पर श्रुतिदेव जी कहने लगे कि जो कोई धर्मात्मा बैशाख में व्याकुल महात्मा को छत्री दान करता है उसको अनन्त फल मिलता है। मैं एक प्राचीन इतिहास कहता हूँ, सुनो! सतयुग में हेमकांत नाम का बंगाल देश का राजा था। यह राजा कुश केतु का पुत्र तथा अत्यन्त बलवान था। वह राजा एक समय शिकार खेलने वन में गया और वहाँ पर अनेक मृग शूकरों को मारता हुआ दोपहर में बहुत थक गया तो मुनियों के आश्रम में पहुँचा। उस समय शतीर्च नामक ऋषि ध्यान लगाये समाधि अवस्था में बैठे हुए थे। उसको यह भी मालूम न हुआ कि आश्रम में कौन आया है । वह निश्चिंत बैठे रहे और राजा का कुछ भी सम्मान नहीं किया। इस पर राजा को बड़ा क्रोध आया और वह ऋषि को मारने के लिए आगे बढ़ा। तब ऋषि के शिष्यों ने उसे रोका और कहा कि अरे दुर्बुद्धि! सुन हमारे गुरु समाधिस्थ होकर बैठे हैं उनको यह भी पता नहीं कि बाहर क्या हो रहा है इसलिए क्रोध करना उचित नहीं। तब राजा क्रोधित होकर कहने लगा कि हे ब्राह्मणों! मैं थक गया हूँ और तुमने मेरा अतिथि सत्कार तक नहीं किया। तब शिष्यों ने कहा कि हम तो गुरु के आधीन हैं बिना गुरु की आज्ञा के कुछ भी नहीं कर सकते। शिष्यों का ऐसा प्रत्युत्तर सुनकर क्रोध से राजा ने अपना धनुष उठा लिया और कहने लगा कि मुझ से दान लेकर मेरा अन्न खाकर मुझको ही शिक्षा देते हो, ऐसे कृतघ्नों को अवश्य मारना चाहिए। इतना कहकर राजा उन पर बाण चलाने लगा। इसी से वह शिष्य भयभीत होकर भागने लगे तो राजा के सैनिको ने उनको चारों तरफ से घेर लिया। राजा ने उनमें से तीन सौ शिष्यों को मार दिया और भाग गये। जब आश्रम में कोई न रहा तो सैनिकों ने आश्रम की सब वस्तुएँ लेकर खूब भोजना किया। सायंकाल राजा जब अपने घर पर आया तो उसके पिता कुशकेतु ने यह सब वृत्तान्त सुनकर पुत्र की बहुत निंदा की तथा उसको घर से बाहर निकाल दिया। जब पिता ने उसे त्याग दिया और राजा हेमकांत वन में चला गया तो वह अत्यन्त व्याकुल होकर इधर-उधर फिरने लगा और ब्रह्महत्या उसे सताने लगी। इस प्रकार उस दुरात्मा को फिरते हुए २८ वर्ष बीत गये । तब एक दिन त्रित नाम के ऋषि बैशाख मास तीर्थ यात्रा करते हुए उस वन में आये और धूप से व्याकुल होकर मूर्छा खाकर पृथ्वी पर गिर पड़े। दैवयोग से हेमकांत ने ऋषि को मूर्छा खाकर गिरते हुए देख लिया और उसके मन में बड़ी दया उत्पन्न हुई। उसने ढाक के पत्तों के एक छत्री बनाकर मुनि के सिर पर लगाई और अलम्बुका जल पिलाया। इस उपचार के करने से मुनि मूर्छा से निवृत हुए तथा इन्द्रियों में कुछ चैतन्यता आ जाने से शनैः शनैः गांव में पहुँचे । इस पुण्य के प्रभाव से उसकी तीन सौ ब्रह्महत्याएँ क्षण भर में दूर हो गईं। तब हेमकांत को बड़ा विस्मय हुआ कि उसके द्वारा इतने प्राणियों को इतना कष्ट देने पर भी उसकी ब्रह्म हत्याएं कैसे दूर हो गयीं किसने दूर कर दीं। कहां गयीं और इसका कारण क्या है? जब वह सोच ही रहा था तो उसकी मृत्यु निकट आ गई और उसके संग्रहणी रोग लग गया। जब उसके प्राण निकलने लगे तो उसको तीन बड़े- बड़े भयंकर यमदूत दिखाई पड़े और वह हेमकांत को डराने लगे। तब हेमकान्त मौन साध का छात्रदान को याद करके विष्णु भगवान् को याद करने लगा। भगवान ने उसी समय अपने मन्त्री विश्वकसेन को आज्ञा दी कि यमदूतो को रोको और बैशाख मास में छत्रदान करनेवाले हेमकान्त की रक्षा करो। उसने यद्यपि बड़े बड़े पाप किये हैं और उसने धूप से व्याकुल मूर्छित मुनि की रक्षा की और बैशाख मास छत्री दान किया, इससे निष्पाप हो गया।।


|| ॐ  नमो भगवते वासुदेवाय ||

वैशाख मास.   महातम्य.  चौदहवां अध्याय.                             तब राजा पूछने लगा कि हे ब्रह्मन्! बैसाखमास के धर्म अति सुलभ हैं और ऐसे अनेक पुण्यों के देने वाले हैं जो भगवान् को प्रसन्न करते हैं, और तत्काल ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाले हैं परन्तु ऐसे वेदानुकूल धर्म भी संसार में ज्ञात नहीं हैं। अनेक प्रकार के राजसी धर्म और तामसी धर्म ही इस संसार में विख्यात हैं इसका क्या कारण है? श्रुतिदेव कहने लगे कि हे राजन्! संसार में भोगों की ईच्छा करने वाले मनुष्य अधिक संख्या में हैं ईसलिए रजोगुण और तमोगुण अधिकांश में पाया जाता है। बहुत थोड़े मनुष्य ऐसे हैं जो मोक्ष प्राप्ति के साधन करने वाले हैं। अतः वह बहुत ही कठिनता से मिलते हैं। मोक्ष धर्म क्योंकि इच्छा रहित है, इस कारण इससे लौकिक और पारलौकिक सुख के साधन होते है । वैष्णवी माया से मोहित होकर मनुष्य इसको समझता नहीं। जैसे अधिपत्य के प्राप्त होने पर मनुष्य के मनोरथ पूर्ण होते हैं। परन्तु बैशाख मास के सब धर्म सात्विकों के लिए कहे गये हैं और यही सतोगुणियों का धर्म है। इस पर एक पुरातन इतिहास कहता हूँ। इक्ष्वांकु वंश में नृग पुत्र एक बड़ा यशस्वी, अक्रोधी, ब्राह्मणों का मान करने वाला राजा हुआ है। एक दिन वह शिकार खेलता हुआ वशिष्ठ जी के आश्रम जा पहुंचा। वहां पर उसने देखा कि आश्रम में मार्ग में वशिष्ठ जी के शिष्यों ने कहीं प्याऊ रखी है, कहीं छाया-मंडल बना रखा है। कहीं बावड़ी साफ करवा रहे हैं। कहीं बैठे हुए लोगों पर पंखे से हवा कर रहे हैं, कहीं सुगंधित वस्तुएं और फल बांट रहे हैं, मध्याहन के समय छत्री दान कर रहे हैं, सायंकाल को पीने की वस्तुएं दे रहे हैं। राजा ने उनसे पूछा कि कौन हो और क्या कर रहे हो? उन्होंने उत्तर दिया कि हम महर्षि वशिष्ठ के शिष्य हैं उन्हीं की आज्ञा से बैशाख मास के धर्मों को कर रहे हैं। राजा ने फिर पूछा कि इन धर्मों को करने से कौन सा देवता प्रसन्न होता है ओर क्या फल मिलता है? वह कहने लगे कि राजन हम अपने गुरु की आज्ञा से यह सब कर रहे हैं हमको बताने का अवकाश नहीं। अतः आप हमारे गुरुजी से यह सब बातें पूछ सकते हो । शिष्यों की यह बात सुनकर वह महा यशस्वी राजा सम्पूर्ण धर्म के तत्वों को जानने वाले श्री वशिष्ठ जी के आश्रम की तरफ चल दिया। उनका आश्रम विद्या और योग का स्थान था । राजा को अपने आश्रम में आया देखकर ऋषि ने अत्यन्त प्रसन्न चित्त होकर साथियों के सहित राजा का अतिथि सत्कार किया। राजा बड़ी प्रसन्नता और नम्रतापूर्वक बैठकर गुरु जी से पूछने लगा कि गुरुदेव मैं आखेट से थक कर आपके आश्रम की तरफ आ गया था तो मैंने आपके शिष्यों को बहुत से धर्म कार्यों को करते हुए देखा इसलिए महाराज मेरे मन में बड़ी उत्कंठा उत्पन्न हो रही है कि यह सब धर्म के कार्य करने से क्या फल उत्पन्न होता है। वशिष्ठ जी कहने लगे कि जो सब धर्मों को छोड़कर विषयासक्त हो जाता है वह भी यदि प्रातःकाल वैशाख का स्नान करे तो भगवान का प्रिय हो जाता है। जिसने धर्म के सब कार्य सांगोपांग किये हों किन्तु बैशाख का आदर न किया हो। तो भगवान उससे दूर ही रहते हैं। जिसने बैशाख मास बिना दान तथा स्नान खो दिया वह इस कर्म से चांडाल योनि में जन्म लेता है। बैशाख मास में जिसने विधिवत भगवान की आराधना की भगवान उसी से प्रसन्न होते हैं और उसी की शहर में मनोकामना पूरी करते हैं। जो भक्ति और श्रद्धा जो मनु से भगवान का थोड़ा भी पूजन करता है वह उसी से प्रसन्न हो जाते हैं, अधिक धन अथवा अधिक परिश्रम वह नहीं देखते। बैशाख मास आयु से शहर इष्ट के धर्म अति सुगम हैं तथा भगवान को प्रसन्न का प करने के लिए उनमें श्रम भी थोड़ा और व्यय स भी अधिक नहीं करना पड़ता है। इसलिए जो स्थान बैशाख के धर्मों को नहीं करता वह अवश्यमेव योग्य दंडनीय है। इस प्रकार ऋषि ने राजा को सब करो शास्त्रोक्त बैशाख धर्म समझाये। तब राजा सब वाल धर्मों को सुनकर तथा यथोचित गुरुजी की पूजा पांच करके अपने घर चला गया और घर पहुँचकर हीन शाख मास के सभी धर्म करन लगा ll                                                                      || ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

वैशाख मास महातम्य

पन्द्रहवां अध्याय

फिर राजा ने हाथी पर ढोल रख कर सारे शहर में यह सूचना कराई कि आठ वर्ष की आयु से लेकर अस्सी वर्ष की आयु तक का जो मनुष्य मेष की संक्रान्ति में सूर्योदय से पहिले स्नान नहीं करेगा वह दंडनीय समझा जाकर शहर से निकलवा दिया जायेगा। पुत्र, भार्या, इष्ट मित्र चाहे कोई भी हो जो बैशाखोक्त धर्म का पालन नहीं करेगा मैं उसको चोर के समान समझुंगा। प्रातःकाल पवित्र जल में स्नान करो, स्थान-स्थान पर प्याऊ लगाओ, यथाशक्ति योग्य ब्राह्मणों को दान तथा अन्य धर्म के कार्य करो। प्रत्येक गांव में एक-एक उपदेश करने वाला विद्वान ब्राह्मण नियुक्त कर दिया, तथा पांच गांवों पर एक अधिकारी। इसी प्रकार धर्म हीनों को दण्ड देने के लिए दस-दस सवार नियत कर दिये। इस प्रकार चक्रवर्ती राजा के शासन में यह धर्म- -वृक्ष सारे देश में विस्तार पूर्वक फैल गया। इस राज्य में जो पापी मर जाते थे वे भी बैकुण्ठ को प्राप्त होते थे। बैशाख मास में एक बार के स्नान से पापों से मुक्त होकर कोई प्राणी भी यमपुरी को नहीं जाता, इस कारण उस सूर्यवंशी राजा ने यम के सब लेखों को मिटा दिया। मनुष्यों के जो भी पुराने कर्म थे सब नाश हो गये, बिचारे चित्रगुप्त के लिए लिखने को कुछ भी न रहा तथा सब नरक भी खाली हो गए। तब एक समय नारद जी धर्मराज के पास जाकर कहने लगे कि राजन्! नरक में पहले जैसे हाहाकार शब्द नहीं सुने जाते हैं, चित्रगुप्त के पास भी लिखने को कुछ नहीं। हाथ पर हाथ रखे मुनि बैठे हैं, बड़े-बड़े पापी भी अब तुम्हारे लोक में नहीं आते, इसका क्या कारण है? तब धर्मराज कहने लगे कि हे महामुने! एक राजा पृथ्वी पर हुआ है अपने राज्य में उसने आज्ञा दी है कि जो कोई बैशाख के धर्मों का पालन नहीं करेगा वह दण्डनीय होगा सो उसके डर के मारे प्राणी वैशाख मास के धर्मों का पालन करके बैकुण्ठ को जा रहे हैं। वह राजा चक्रवर्ती है और सारे संसार में उसकी आज्ञा का पालन होता है। कर्मों के नाश से चित्रगुप्त के लिए लिखने को कुछ न रहा। और मैं काठ की मूर्ति के समान बैठा हूं। अब मैं युद्ध करके उसको मारूंगा, क्योंकि मेरे पास अब काम कुछ न रहा और सेवक को स्वामी का कार्य अवश्य करना चाहिए। यदि वह मुझसे नहीं मरेगा तो ब्रह्मा जी के पास जाकर सब निवेदन कर दूंगा इस प्रकार नारद जी से कहकर यमराज मृत्यु, रोग, जरा आदि सब सेवकों और अपने दूतों को साथ लेकर दण्ड धारण कर भैंसे पर चढ़ पृथ्वी पर आया और सिंहनाद करते हुए उस राजा की नगरी को चारों ओर से घेर लिया। इससे समस्त प्रजा अत्यन्त भयभीत हो गई। राजा भी यह सुनकर कि यम ने पुरी को घेर लिया है, अपनी सेना को सजाकर नगर के बाहर आया। फिर दोनों में ऐसा घोर युद्ध हुआ कि रोमाँच खड़े हो गये। राजा ने थोड़ी देर में मृत्यु, काल तथा रोग और यमराज के दूसरे दैत्यों को मारकर भगा दिया। तब भैंसे पर सवार यमराज स्वयं राजा के सन्मुख आया और भीषण गर्जना करके राजा पर बाण चलाने लगा। राजा ने तीन बाणों से उसके धनुष को काट दिया। अब यम ढाल तलवार ले राजा को मारने के लिए चला, तब राजा ने उसकी ढाल तलवार भी काट दी और काले सर्प की फुंकार मारता हुआ क्रोधित होकर एक बाण यम के मस्तक पर मारा। तब यमराज ने क्रोधित हो अपना दंड उठाया और ब्रह्मास्त्र से अभिमंत्रित कर राजा पर छोड़ दिया। उस समय बड़ा हा-हाकार मच गया तब विष्णु भगवान ने अपने भक्त की रक्षा हेतु सुदर्शन चक्र छोड़ा, जो युद्धस्थल में आ, दण्ड से युद्ध कर ब्रह्मास्त्र को निवारण करता हुआ यमराज को मारने लगा। यह देख वह भक्त राजा भयभीत होकर चक्र की स्तुति करने लगा कि हे विष्णु भगवान के हाथ के आभूषण, सहस्त्रधार तुम्हें नमस्कार है। भगवान तुमको सारे लोक की रक्षा के लिए धारण करते हैं। क्योंकि जो देवताओं के द्रोही हैं तुम उनके काल हो! सो हे जगतपते इस यम की रक्षा करो। ऐसी स्तुति सुनकर चक्र यम को राजा के पास छोड़कर स्वयं बैकुण्ठ को चला गया। फिर यम उदासीन होकर ब्रह्मलोक में ब्रह्माजी के पास गया। उसको इस प्रकार देखकर सब सभासद विस्मित होकर आपस में कहने लगे कि यम का यहां पर कैसे आना हुआ, कहीं ब्रह्मा जी के दर्शन को तो नहीं आया। इसको तो कभी क्षण भर को भी अपने काम से अवकाश नहीं मिलता। देवता तो आकुल हैं? ऐसी बात न कभी पहले देखी न सुनी। यह सब ऐसा कह ही रहे थे कि तभी प्राणियों का स्वामी और सूर्य का पुत्र यम ब्रह्मा जी के चरणों में इस प्रकार गिर गया जैसे जड़ से कटा हुआ वृक्ष निराश्रित होकर पृथ्वी पर गिर जाता है । वह त्राहि-त्राहि पुकारने लगा कि हे देवेश! मेरा अत्यन्त अपमान हो गया है। मेरे वस्त्र फाड़ डाले और मुझको अत्यन्त पीटा गया है। मेरी प्रतिष्ठा और मर्यादा सब भंग हो गई। हे कमलासन! आपके होते हुए मेरी यह दुर्गति हुई। ऐसा कह यम मूर्छा खाकर पृथ्वी पर गिर गया, तब वहां पर बड़ा कोलाहल हुआ। सब आपस में विचार करने लगे कि जो स्थावर जंगम सब को खाने वाला, मनुष्यों को संताप देने वाला, दुःखी क्यों हो गया? तब पवन ने आकर ब्रह्मा जी की आज्ञानुसार सब की वाणी रोक दी और अपनी विशाल भुजाओं से यम को उठाया। फिर समस्त संसार में विचरने वाला उदार बुद्धि उसे आसन पर बिठाकर कहने लगा कि किसने तेरा अपमान किया, तुम को तुम्हारे स्थान से निकाल दिया, तुम्हारे वस्त्र और बही खाते किसने फाड़ डाले? सो यह वृत्तान्त तुम ब्रह्मा जी के सन्मुख कहो, जो सबके पितामह हैं, वे ही तुम्हारे दुःख दूर करेंगे । जब यम ने पवन के ऐसे वचन सुने तो यमराज ब्रह्मा के मुख की तरफ देखकर अत्यंत दीन स्वर में सत्यतपूर्वक सब बातें कहने लगा ।।
|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||    .             .                    

वैशाख मास महात्म्य सोलहवां अध्याय

यम कहने लगा कि ब्रह्मन्! मेरा सर्वनाश हो गया। जिसका पद खंडन हो जाय उसका जीवन ही वृथा है। स्वामी सेवक की जिस कार्य पर नियुक्ति करे और वह उस कार्य को न कर सके तथा स्वामी का धन खाता रहे तो वह काठ का कीड़ा (घुन) बनता है। अब मैं आपका कार्य नहीं कर सकता क्योंकि राजा कीर्तिमान ने यह सब कर्म नष्ट कर दिया है। इस मास के भय से समुद्र तक सब प्रजा बैशाख मास के कर्तव्य-धर्म का पालन करती है और अन्य धर्म के कार्य, पितरों का श्राद्ध, अग्निष्टोम होमादि यज्ञ, तीर्थयात्रा तथा विविध दूसरे शुभ कार्य छोड़ दिये हैं। योग, सांख्य, प्राणायाम करना, होम स्वाध्याय सब कुछ छोड़कर अन्य प्रकार के पाप करके भी बैशाख मास में किये धर्मों के प्रभाव से बैकुण्ठ को चले जाते हैं। जो कोई शुभ कर्म करता है वही इसका शुभ फल भोगता है। परन्तु बैशाख धर्म से उनके सिवाय तीनों कुलों की अर्थात् छब्बीस पीढ़ी का बैकुण्ठ वास हो जाता है। जो गति देवताओं को यज्ञादि करने से भी नहीं मिलती, अनेकों तीर्थों की यात्रा, यज्ञ, दान, तप, व्रत, प्रयाग में मरने, रण में मरने या काशी में मरने से नहीं मिलती, वह बैशाख धर्म से सहज ही में मिल जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि बैकुण्ठ का कोई परिमाण नहीं जो इतने मनुष्यों से भी नहीं भरता। अब मेरा कार्य न रहने से मैं राजा को अपने शत्रु मानता हूँ। क्योंकि राजा की आज्ञा से सभी मनुष्य बैशाख धर्म का पालन करत हैं ।।



|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||                        

सत्रहवां अध्याय

ब्रह्मा जी कहने लगे कि हे यम! इसमें आश्चर्य की क्या बात है, गुणवानों से ईर्ष्या करना दुःख का कारण होता ही है। यह बैशाख मास भगवान को अति प्रिय है, इसके धर्मों को के सुनने मात्र से अनेक पाप दूर हो जाते हैं। जो ही बैशाख धर्म का पालन करता है और उसके नों गुणों का गान करता है उस पर भगवान् प्रसन्न में होते हैं। ब्रह्मा जी कहते हैं हे यम! उस राजा पर में मेरा कोई प्रभाव नहीं, क्योंकि विष्णु के भक्तों का अशुभ करने की किसकी सामर्थ्य है। उनके भक्तों को जरा, मृत्यु, व्याधि आदि का कुछ भी भय नहीं होता। सेवक को स्वामी ने जिस काम के लिए नियुक्ति किया है, जब तक उसमें शक्ति है किये जाए और जब कार्य करने की शक्ति न रहे तो स्वामी से निवेदन कर दे उसी समय वह उऋण हो जाता है और उसे कोई दोष स्वामी का कार्य न करने का नहीं लग सकता। अपना कर्तव्य कार्य करने में प्राणियों को कोई दोष नहीं लगता। हे यम! तुम इस कार्य के करने में असमर्थ हो तो तुम्हारा क्या दोष है। जब ब्रह्मा जी ने ऐसा कहा तो यम अत्यन्त दुःखी होकर अश्रुपात करने लगा तथा मिल गया अत्यन्त दीन वाणी से बोला कि हे पितामह ! आपकी सेवा से मुझको सब कुछ परन्तु अब मुझे अपने काम पर जाने की तब तक इच्छा नहीं है जब तक भूमंडल पर यह राजा राज्य करता है। जब तक इस राजा को इस कार्य से मैं चलायमान नहीं कर देता, मुझको विश्राम नहीं प्राप्त हो सकता। आप मेरे इस कार्य को सिद्ध कर दीजिए तब ही मैं फिर शासना कर सकता हूँ। यम की यह बात सुनकर ब्रह्मा जी सोच में पड़ गये। थोड़ी देर विचार करके ब्रह्मा जी यम को समझाते हुए बोले कि हे यम इस वैष्णव धर्म में परायण राजा का निग्रह तू नहीं मानता तो चल विष्णु भगवान के पास चलते हैं, जैसी वह आज्ञा करेंगे वैसा ही किया जाएगा। ऐसा कह ब्रह्मा जी यम को साथ लेकर क्षीरसागर में गये और निर्गुण रूप परमेश्वर अद्वितीय पुरुषोत्तम भगवान की सांख्य योग से स्तुति करने लगे। इस प्रकार की स्तुति पर श्री विष्णु भगवान प्रकट हुए और गंभीर वाणी से कहने लगे कि तुम्हारे आने का क्या कारण है, क्या तुम राक्षसों द्वारा सताये गये हो? यम का मुख मलीन और कंधे झुके हुए दिखाई देते हैं । तब ब्रह्मा जी कहने लगे कि हे प्रभु! राजा कीर्तिमान की आज्ञानुसार उनके शासन में सब मनुष्य बैशाख के धर्मों का पालन करके विष्णु पद को प्राप्त करते चले जा रहे हैं। इस कारण जब सारी यमपुरी खाली हो गई तो यम युद्ध करने के लिए राजा के पास गया और अपना दंड उठाकर राजा को मारने लगा तो आपके सुदर्शन चक्र ने इसको परास्त कर दिया। अब यह दुःखी होकर मेरे पास आया है। हम आपके भक्तों को दण्ड देने की सामर्थ्य नहीं रखते हैं इसलिए आपकी शरण में आये हैं। अब हे महाप्रभो! आप राजा को दंड देकर यम की रक्षा कीजिए। ब्रह्मा जी की यह वार्ता सुनकर भगवान् कुछ हँसकर कहने लगे कि हे ब्रह्मा जी तथा यम! मैं लक्ष्मी जी, अपनी देह और प्राण भी त्याग सकता हूँ, श्री वत्स, कौस्तुभ मणि तथा वैजन्ती माला का त्याग कर सकता हूँ, श्वेत द्वीप, बैकुण्ठ, क्षीर सागर, गरुड़ और शेष को भी छोड़ सकता हूँ, परंतु अपने भक्तो को नहीं छोड़ सकता। आप ही सोचिये, जिन्होंने मेरे लिए सर्वस्व त्याग दिया और अपनी आत्मा मुझमें ही लगा दी मैं उनको कैसे त्याग सकता हूँ। फिर भी हे यम! मैं तेरे दुःख को दूर करने का उपाय बतलाता हूँ। इस राजा की आयु मैंने दस हजार वर्ष की दी है जिसमें आठ हजार वर्ष बीत चुके हैं। अब दो हजार वर्ष की आयु और भोगकर वह मेरी सायुज्य मुक्ति को प्राप्त होगा तब वेन नाम का एक राजा बड़ा दुराचारी होगा और सब वेदोक्त धर्मों को नष्ट कर देगा। तब बैशाख धर्म भी लोप हो जायेंगे और वह स्वयं अपने पाप से जल जायेगा। फिर मैं पृथु अवतार लेकर पुनः धर्म की स्थापना करूंग और बैशाख धर्म भी मनुष्यों से कराऊँगा। जो मेंरा भक्त, जिसने मुझमें ही अपना ध्यान लगा दिया है और सर्वस्व त्याग दिया है वह कोई हजारों में से एक ही होता है, उसको ही बैशाखोक्त धर्म कहना चाहिए। बहुत थोड़े मनुष्य पृथ्वी पर मेरे इस धर्म को जानने वाले है। अब हे यम! तू किसी प्रकार से दुःखी मत हो । तेरे काम की सिद्धि हो जायेगी। वह राजा तेरा भाग भी देगा। अपने-अपने भाग को ग्रहण करने वाला दुःखी नहीं होता। जो मनुष्य उद्देश्य से प्रतिदिन स्नान, अर्घ्य, जलकुम्भ, दही, अन्नादि का दान नहीं करेंगे उनका बैशाख धर्म निष्फल हो जायेगा। वह राजा अवश्य तुमको भाग देगा, क्योंकि वह मेरा भक्त है। जो कोई प्राणी तुम्हारा भाग देकर बैशाखोक्त धर्म करे उसके कार्य में तुम विघ्न मत डालो और जो तुम्हारा भाग दिये बिना ही केवल मेरा भजन करता है उसको मेरी आज्ञा से तुम अवश्य दण्ड दो। उस राजा से तुम्हें भाग दिलाने के लिए मैं अभी सुनन्द को भेजता हूँ वह अवश्य राजा को समझाकर तुम्हें भाग दिलायेगा। इस प्रकार हर तरह से यम को आश्वासन देकर भगवान अंतर्धान हो गए। यम भी प्रसन्नता से अपनी पुरी को चला गया और फिर भगवान् की आज्ञा से जैसे सुनन्द ने राजा को समझाया सभी ने बैशाख मास के धर्मों में यम को भाग दिया। इसलिये बैशाख मास में प्रतिदिन यम के निमित्त स्नान अर्ध्यादि करना चाहिए, नहीं तो बैशाख के सब कर्म निष्फल हो जाते हैं। बैशाख की पूर्णिमा को सबसे पहले यमराज के निमित्त जल का घड़ा, दही तथा अन्न दान करना चाहिए फिर पितरों और गुरु के निमित्त, पश्चात् भगवान के निमित्त शीतल जल, दही, अन्न, तांबूल दक्षिणा और फल कांसे के पात्र में रखकर भगवान के अर्पण करें। इस प्रकार राजा अपनी समस्त आयु को भोगकर अपने पुत्र-पौत्रादि समेत बैकुण्ठ को चला गया। जब वह राजा बैकुण्ठ को चला गया तो वेन नाम का महा पापी और नीच राजा हुआ। उसने सब धर्मों तथा बैसाख के धर्मों का भी लोप कर दिया।।  || ॐनमो भगवते वासुदेवाय ||                                    .                                       

अठारहवाँ अध्याय:-  श्रुतिदेव कहने लगे कि बैशाख मास की मेष संक्रान्ति में जो प्राणी प्रातः स्नान कर भगवान की पूजा करके भगवान की कथा सुनता है वह मनुष्य बैकुण्ठ को जाता है। परन्तु जो होती हुई कथा को छोड़कर चले जाते हैं और नहीं सुनते, वह रौरव नरक में जाकर पिशाच योनि प्राप्त करते हैं। यहाँ पर हम एक प्राचीन इतिहास कहते हैं। प्राचीन काल में गोदावरी के किनारे ब्रह्मेश्वर क्षेत्र में ब्रह्मनिष्ठ परमहंस दुर्वासा ऋषि के दो शिष्य रहते थे। उनको कभी किसी से कोई इच्छा नहीं थी। भिक्षा में जो कुछ मिल जाता वही खाकर निर्वाह कर लेते और पर्वत की गुफा में रहते। इन दोनों का नाम सत्यनिष्ठ और तपोनिष्ठ था। इनमें सत्यनिष्ठ तो सदैव भगवान् की कथा आदि सुनता। कथा सुने बिना अन्न जल ग्रहण नहीं करता था। जो वक्ता रोग से पीड़ित होकर अपने घर कथा कहता तो यह कुएँ आदि पर स्नान करके उसके घर जाकर ही कथा सुनता। कथा समाप्त हो जाने पर अपने नित्य नियम करता। जो मनुष्य इस प्रकार प्रेम से कथा सुनता है वह जन्म मरण के बन्धन से छूट जाता है। उसकी भगवान में सच्ची भक्ति उत्पन्न होती है तथा उसके समस्त दुःख नाश हो जाते हैं। इस प्रकार वह सत्यनिष्ठ ऋषि उपनिषदों का यही निश्चय करके सदैव भगवान् की भक्ति में तत्पर रहता और सदा उनकी कथा श्रवण करता। दूसरा जो तपोनिष्ठ था वह अत्यन्त दुराचारी एवं कर्मनिष्ठ था। वह न तो स्वयं कथा कहता न सुनता अपितु होती हुई कथा को छोड़कर चला जाता कि कहीं तप में विघ्न न पड़ जाये। श्रोता और वक्ता के पास भी वह नहीं जाता था। बस दुर्बुद्धि इसी प्रकार अपना समय बिताता – न हरि कथा कहता न सुनता। जब वह मृत्यु को प्राप्त हुआ तो कथा के दुराग्रह से छिन्नकर्ण नाम वाला बलवान पिशाच शमी के वृक्ष पर हुआ। वह अपने किये कर्मों का विचार करता हुआ, भूख-प्यास से दुःखी होकर इधर-उधर भटकता फिरता था। कदाचित वहां सत्यनिष्ठ भ्रमण करता हुआ उस पैठीनसीपुर में आ गया। मार्ग में दुःख से पीड़ित छिन्नकर्ण नामक पिशाच को देखा तो वह भूख से आतुर बुरी तरह से रो रहा था। उसको देखकर सत्यनिष्ठ कहने लगा कि तुम कौन हो और तुम्हारी यह दशा कैसे हुई? यह सब कहो। वह बोला, हे प्रभो! मैं दुर्वासा का शिष्य तपोनिष्ठ नाम वाला यती हूँ। अपनी दुर्बुद्धि के कारण महात्माओं से विष्णु कथा कर्मों के लोप हो जाने के भय से कभी नहीं सुनी और न ही कभी कथा सुनाई। इस घोर कर्म से मेरी मृत्यु हुई और छिन्नकर्ण नाम वाला पिशाच होकर इस वन में दुःखी होकर भटकता फिरता हूँ। रास्ते में तुमको जाता देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे भाग्य फिर गये हैं, आज हरि मुझ पर प्रसन्न हैं जो आपने नहीं दर्शन दिये। इस प्रकार रोकर और “त्राहि त्राहि” ऐसा कहकर वह सत्यनिष्ठ के चरणों में गिर पड़ा। सत्यनिष्ठ को उस पर बड़ी दया आई। उसने अपने दोनों हाथों से उसको उठा लिया शिर और बैशाख मास की कथा के क्षण भर सुनने की का फल उसको दे दिया, जिससे उसके सब को पाप नष्ट हो गये। इस प्रकार वह कर्मनिष्ठ अपनी पिशाच देह को त्याग, दिव्य शरीर धारण कर विमान पर बैठ सत्यनिष्ठ को प्रणाम तथा परिक्रमा कर विष्णु लोक को गया।।                || ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

उन्नीसवां अध्याय

श्रुतिदेव कहने लगे कि बैशाख महात्म्य का फल और भी सुनो। पांचाल देश के राज भूरियश का पुत्र पुरुयश नाम वाला अत्यन्त पुण्यात्मा तथा बुद्धिमान था। पिता के मरने पर वह राजा बना। वह धर्म पूर्वक पृथ्वी का राज्य करता था, परन्तु पूर्व जन्म में उसने जलदान नहीं किया था, इस कारण उसकी सब सम्पत्ति नष्ट हो गई। इस प्रकार उसको बलहीन देखकर उसके कई एक शत्रु राजाओं ने उस पर आक्रमण कर दिया। बेचारा राजा परास्त होकर अपनी शिखनी रानी और कुछ धात्रियों के सहित पर्वत की एक ऐसी गुफा में छिप गया जिसका रास्ता कोई नहीं जानता था। राजा ने बड़ी व्याकुलता से वहां पर ५३ वर्ष व्यतीत किये। अब राजा के मन में यह चिन्ता उत्पन्न हुई कि मैं जन्म और कर्म से तो शुद्ध हूँ। मैंने जन्म भी अच्छे कुल में लिया, परन्तु न जाने मेरे सब पौरुष कहाँ गये । मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया है जिससे यह घोर दरिद्र व पराजय हुई तथा वनवास के दुःख सहने पड़ रहे हैं। इस प्रकार वह राजा अपने गुरु का स्मरण करने लगा। तब राजा के स्मरण करते ही दो मुनीश्वर याज और उपयाजक नाम वाले वहाँ आकर उपस्थित हुए। राजा ने उनको देख सहसा खड़े होकर भक्ति पूर्वक शीश नवाया। बनवास से दुःखी, राज-चिह्न से हीन,वन के मार्ग को न जानने वाला वह राजा थोड़ी देर चुपचाप खड़ा रहा और फिर रोता हुआ उनके चरणों में गिर गया। तब दोनों मुनियों ने पकड़ कर राजा को उठाया। इसके पश्चात् राजा ने वन के पुष्पों से विधिवत् उनका पूजन किया। जब वह दोनों बैठ गये तो राजा ने बड़ी नम्रता से उनसे प्रश्न किया कि महाराज! मैं जन्म से तो शुद्ध हूँ, पितरों और देवताओं का पूजन भी करता हूँ, पाप से डरता हूँ, प्राणियों पर दयावान, गुरु की भक्ति में प्रीति रखने वाला हूँ। फिर क्या कारण है कि मैं ऐसा दरिद्री हो गया हूँ, मेरा सब कोष नष्ट हो गया, शत्रुओं ने मुझको जीत लिया। वन का वासी अकेला क्यों रह गया? मेरे पुत्र, पौत्र, भाई, बन्धु, मित्र कोई नहीं रहा, मैं निष्पाप होकर राज्य कर रहा था, फिर भी मेरे राज्य में अकाल क्यों पड़ गया? इसका कारण आप विस्तार पूर्वक मुझसे कहिये। राजा के ऐसे वचन सुन थोड़ी देर सोचकर वह दोनों मुनि याज और उपयाजक कहने लगे कि हे राजन्! तू अपने दुःख का कारण सुन! पहले दस जन्मों में तू अत्यन्त घोर पापी व्याध रहा है। दसवें जन्म में भी तू बड़ा कठोर हृदय व्याध का जन्म धारण कर प्राणियों का वध करने में यमराज के तुल्य था। जब दसवें जन्म में तू गौड़ देश में था और अपने घोर बुरे कर्मों से लगा हुआ यात्रियों को निर्दयता से कष्ट दिया करता था तोउसी समय धूप से व्याकुल दो बड़े धनवान वैश्य और वेद वेदांगों को जानने वाले कर्षण नाम वाले मुनि वहां पर आये। शिर पर जटा, देह पर छाल के वस्त्र, हाथ में कमंडल लिए हुए उनको आता देखकर तू धनुष बाण लेकर उनका रास्ता रोक कर खड़ा हो गया फिर उनमें एक वैश्य को मारकर तूने सब धन छीन लिया। जब तू दूसरे वैश्य को मारने लगा तो वह समस्त द्रव्य वहीं घास फूंस में फेंककर डर के मारे भाग गया। तब कर्षण मुनि व्याध के हाथ से मारे जाने के भय से व्याकुल हो मूर्छा खाकर पृथ्वी पर गिर गए। तब तूने गिरे हुए ऋषि से पूछा कि वैश्य ने धन कहाँ छिपाया है। फिर एक गढ़े के पानी से उनके हाथ मुंह धोये और उनको मूर्छा न आ जाये इस कारण उन पर पंखे से हवा करने लगा और मुनि से कहा कि जब तक मैं इस वन में सशस्त्र हूँ तब तक तुमको किसी बात का भय नहीं। निर्धन मनुष्य सदा सुखी रहते हैं तथा तुम्हारे फटे वस्त्र और टूटे बर्तनों को लेकर भी मैं क्या करूंगा। तुम केवल यही बताओ कि उस वैश्य ने धन को कहां छिपाया है? यदि ठीक नहीं बताओगे तो तुम्हें मार डालूंगा। कर्षण बोले कि वैश्य धन को इन वृक्षों में फेंक गया है और स्वयं इधर भाग गया है। तब व्याध ने ऋषि से कहा कि निडर होकर सुख पूर्वक यहां से चले जाओ। यहां से थोड़ी दूर पक्के तालाब में निर्मल जल है, वहां जल पीकर और अपना परिश्रम दूर कर अपने स्थान को चले जाओ। अभी राजा के कर्मचारी वैश्य का रुदन सुनकर तथा पाँवों के निशान देखते हुए इधर आयेंगे इसलिए मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकता। यह पंखा ले नाओ इसकी हवा से कुछ गर्मी कम हो जायेगी। इस प्रकार तुम पंखा देकर गहन वन में चले आये। यद्यपि तुमने कार्यवश उसकी सेवा की थी, परन्तु बैशाख मास की प्रचंड धूप में तुम्हारे द्वारा की गई इस सेवा के परिणाम स्वरूप तेरा जन्म विशाल राजवंश में हुआ। यदि तेरी इच्छा अब सुख, राज्य, धन-धान्य लक्ष्मी, स्वर्ग या सायुज्य मुक्ति पाने की है तो बैशाखोक्त धर्म को करो, तुम को सम्पूर्ण सुख प्राप्त हो जायेंगे । इस मास का नाम माधव मास है और तृतीया का अक्षय तृतीया । इस दिन तू तत्काल ब्याई गौ ब्राह्मण को दे, इससे तेरे कोष भर जायेंगे। छत्री के दान से तुझको राज्य की प्राप्ति होगी। विधिवत् स्नान कर माधव भगवान् की पूजा कर, दिव्य प्रतिमा के दान से तेरी विजय होगी, यदि तेरी इच्छा अपने समान पुत्रों की है तो तू सब प्राणियों के हित के लिए प्याऊ लगवा। हे
राजन! इन बैशाखोक्त सब कर्मों के करने से समस्त लोग तेरे वश में हो जायेंगे ! इतना कह दोनों कुल पुरोहित याज और उपयाजक अपने अपने घर को चले गये। तब वह महा पराक्रमी राजा कुल पुरोहितों के कथनानुसार बैशाखोक्त धर्म और भगवान् की पूजा करने लगा जिसके प्रभाव से राजा ने अपनी बची हुई सेना को लेकर पांचाल नगरी में प्रवेश किया। इस प्रकार पुरुयश ने अपना खोया हुआ सारा राज्य पुनः प्राप्त कर लिया।।



|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

बीसवां अध्याय                                                श्रुतिकीर्ति कहने लगे कि मुनिवर बैशाख धर्म के महात्म्य सुनते-सुनते मेरी तृप्ति नहीं होती, क्योंकि भगवान विष्णु की कथा सुनकर किसके कान तृप्त होते हैं। मेरे पूर्व जन्म के पुण्य उदय हो गए हैं जो आप आतिथ्य उपदेश से मेरे घर पधारे। आपके मुख से निकले अमृत रूपी वचनों को पानकर में कृतकृत्य हो गया हूँ। मुझको मोक्षादि की भी इच्छा नहीं है। आप मुक्ति के दाता भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाले दिव्यधर्मों का उपदेश करते जाइये। इतनी वार्ता सुनकर श्रुतिदेव जी बोले कि राजन्! पापों को नष्ट करने वाली मैं एक और कथा कहता हु। पंपातीर पर शंख नाम वाला ब्राह्मण सिंह के बृहस्पति में गोदावरी के किनारे आया और भीमरथी के पार कांटेयुक्त पहाड़ी वन में गया, जहां न जल था न मनुष्य। वह मध्याह्न के समय वृक्ष की छाया में बैठ गया। उसी समय दुराचारी व सबके प्राणों का घातक एक व्याध वहां पर आया और ब्राह्मण के कानों में चमकते हुए सोने के कुण्डल, जूते, छत्र, माला, कमंडल सब छीन कर उसे जाने की आज्ञा दी। तब वह ब्राह्मण उस दुष्ट से छुटकारा पाकर धूप से जलते हुए उस कांटेदार वन में नंगे पैरों, प्यासा हाय हाय करता हुआ, कहीं ठहरता, कहीं चलता चला जा रहा था कि उसके दयायुक्त हाय-हाय शब्द को सुनकर वह व्याध जो कठोर हृदय पापी एवं धर्म-विमुख था उसके हृदय में दय उत्पन्न हुई और उसने अपने मन में सोचा कि इस ब्राह्मण का मैंने सब कुछ हर लिया यह तो मेरा कर्म ही था। लेकिन मैंने इसके नये जूते ही लिये तो अब इसको अपने पुराने जूते क्यों न दे दूं जिससे इस ब्राह्मण के पैरों की रक्षा हो जाये, फिर अब पुराने जूतों की आवश्यकता भी क्या है। ऐसा विचार कर उसने अपने पुराने जूते उस ब्राह्मण को दे दिये। उन जूतों को पहनकर वह ब्राह्मण अति सुखी हो उस व्याध को आशीर्वाद देने लगा कि तुमने बैशाख मास में जूतों का दान किया है अतः तुम्हारे पूण्य उदय हो सकते हैं क्योंकि ऐसे दान से भगवान हरि, पापी व्याध से ही प्रसन्न हो जाते हैं। उस ब्राह्मण से इस प्रकार आशीर्वाद सुनकर व्याध विस्मय से कहने लगा कि हे ब्राह्मण देवता मैंने आपसे ली हुई वस्तु आपको लौटा दी इसमें आशीर्वाद की कौन-सी बात है? और आपने बैशाख मास व हरि की प्रशंसा की यह बैशाख और हरि कौन हैं तथा उनका क्या फल है? ऐसे व्याध के वचन सुनकर ब्राह्मण विचारने लगा कि सब कर्मों का फल जन्मान्तर में मिलता है। अतः ब्राह्मण बोला व्याध! तुमने मुझको ताप नाश करने वाले जूते दान किये हैं जिससे भगवान की कृपा से तेरे पूर्व जन्म के पुण्य उदय हो गये हैं। भगवान तुम पर प्रसन्न हैं। उसी समय मृत्यु द्वारा कल्पित सिंह व्याध के वध के लिए दौड़ता हुआ आया, परन्तु बीच में देव कल्पित हाथी को देखकर पहिले उसको मारने का उद्योग करने लगा। फिर उस वन में उस सिंह और हाथी का घोर संग्राम हुआ जिससे वे दोनों थक कर गिर गये और एक दूसरे को देखने लगे। सब पापों के नाश करने वाली जो यह कथा मुनि ने व्याध को सुनाई थी वह उन्होंने भी सुनी। जिसके सुनने मात्र से ही उनके सब पाप नष्ट हो गये तथा पापों से मुक्त होने के कारण वह पशु योनि को त्याग दिव्य शरीर धारण कर दिव्य विमानों में बैठकर अप्सराओं से सेवित हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब उस मुनि ने उनसे पूछा कि तुम कौन हो और अकारण ही इस वन में एक दूसरे को मारने के लिए क्यों उद्यत हुए? तुम्हारी मृत्यु कैसे हुई? यह सब कथा विस्तार पूर्वक हमसे कहिए।।                        || ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

वैशाख मास महातम्य

इक्कीसवां अध्याय

मुनि के ऐसे वचन सुनकर वह कहने लगे कि मतंग ब्रह्मर्षि के दो पुत्र दलित और कोहल नाम के थे। जो शाप दोष उनके ये नाम हुए। रूप यौवन में सम्पन्न सब विद्याओं में निपुण मतंग ऋषि कहने लगे कि हे पुत्रों! इस बैशाख मास में प्रातः उठकर स्नान करो, मार्ग में प्याऊ लगाओ और छाया करो, पंखे से मनुष्यों को हवा करो, शीतल जल दान करो और भगवान की सेवा करो जिससे संसार के बन्धनों से छूट जाओगे। इस प्रकार उन्होंने अनेकों प्रकार के वाक्यों से समझाया, परन्तु हमारी दुर्बुद्धि में भी कुछ नहीं आया। पिता के वचनों को सुनकर मुझ दलित को अतिक्रोध आया और कोहल मदोन्मत्त हो गया। तब धर्म की लालसा करने वाले हमारे पिता ने क्रोधित होकर श्राप दिया के दलित! क्रोध के कारण तुझे सिंह और मदोन्मत्त होने के कारण कोहल को हाथी की योनि मिलेगी। धर्म से विमुख पुत्र, कटु वचन वाली स्त्री तथा पापी को शीघ्र त्याग देना चाहिए। क्योंकि जो कोई लोभवश होकर इनको नहीं त्यागता वह चौदह मन्वन्तर तक नरक भोगता है। तब हम अत्यन्त दुःखी होकर शाप नवृत्ति के लिए पिता से बारम्बार प्रार्थना करने लगे तो उन्होंने कहा कि तुम दोनों जब पशु योनि में एक दूसरे को मारने के लिए उद्यत होंगे तो उस समय व्याध और शंख का बैशाख धर्म विषयक संवाद तुम्हारे कानों में पड़ेगा, तब उसी समय तुम्हारी मुक्ति हो जायेगी। यहां पर आपका दिव्य संवाद सुना जिसके प्रभाव से हम कृतार्थ हुए । इसके पश्चात वे दोनों मुनीश्वर को नमस्कार कर आज्ञा लेकर अपने पिता के पास चले गए । व्याध भी यह कथा सुनकर अपने शास्त्र आदि फेंककर पुण्यात्मा ऋषि से कहने लगा ।।


|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

वैशाख मास महातम्य :- बाईसवां अध्याय

व्याध कहने लगा कि हे महात्मा मैं अत्यन दुर्बुद्धि और पापी हूँ। हे दया के सागर, अब मुझ पर ऐसी कृपा करो कि जिससे अब मेरी बुद्धि दूषित होकर खोटे कर्मों में न जाय। अतः आप मुझे उपदेश दीजिये। व्याध के ऐसे वचन सुनकर मुनि ने उसको धन्य धन्य कहा और फिर उसको उपदेश देते हुए बोले कि हे व्याध यदि तू शान्ति की इच्छा करता है तो बैशाख के धर्मों का पालन कर। हे व्याध! यहाँ पर धूप अत्यन्त तेज है। न छाया है न पानी, इस कारण चलो कहीं दूसरी जगह जल पीकर और छाया में बैठ स्वस्थ चित्त से तुम्हारे सामने पापनाशक महात्म्य का वर्णन करूंगा। व्याध हाथ जोड़कर कहने लगा कि यहाँ से थोड़ी दूर पर एक निर्मल सरोवर है जहां फलों से लदे हुए अनेक कैथ के वृक्ष हैं, वहां निश्चय ही चित्त प्रसन्न होगा । व्याध की यह बात सुनकर शंख मुनि उनके साथ चल दिए और थोड़ी दूर पर जाकर उन्होंने देखा कि निश्चय ही एक निर्मल सरोवर है । मुनि ने उस सरोवर में स्नान किया। फिर देव पूजन कर व्याध के लाए हुए श्रम नाशक मीठे कैथ के फल खाए। तत्पश्चात् व्याध कहने लगा कि महात्मन! यदि आप मुझ पर कृपा करो तो यह बतलाइये कि कौन-सा कर्म करने से मुझे व्याध जैसी बुरी योनि मिली और फिर आपको सत्संग हुआ। मुनि हँस कर कहने लगे कि तुम शाकल नगर में वेदपाठी ब्राह्मण थे। तुम्हारा नाम स्तम्ब और गोत्र श्रीवत्स था। एक वेश्या से तुम्हारा प्रेम था, उसी से संगति दोष से हमने नित्य कर्मों को त्याग दिया तथा शूद्र के समान रहने लगे। इस प्रकार तुमने आचारहीन होकर धर्म का त्याग किया, परन्तु तुम्हारी स्त्री जो अत्यन्त रूपवती थी, तुम्हारी और वेश्या की सेवा किया करती थी। तुम दोनों पलंग पर सोते और वह नीचे सोती, तुम्हारे पैर धोया करती तथा तुम दोनों की आज्ञा का पालन करती थी। वेश्या के मना करने पर भी वह पतिव्रता, वेश्या सहित तुम्हारी सेवा करती थी। एक दिन तुमने भैंस का दूध और मूली खाई तथा तिल भी खाये। इस अपथ्य भोजन से तुमको दस्त और वमन दोनों होने लगे और फिर दारुण भगन्दर रोग हो गया। जब तक घर में धन रहा वेश्या भी वहां रही, फिर सब धन लेकर वह भी चली गई। इस पर तुमको बड़ी घृणा हुई और तुमने अपनी पतिव्रता स्त्री से कहा कि मैं अत्यन्त निष्ठुर तथा वेश्यागामी हूँ। हे सुन्दरी! मुझ पापी ने तेरा कुछ भी उपकार नहीं किया। जो अपनी नम्र भार्या का मान नहीं करते वह पन्द्रह जन्म तक नपुंसक होते हैं। मैं रात दिन महात्माओं और तेरी अवज्ञा करने से निश्चय ही पाप योनि में पडूंगा। तेरे विनीत भाव पर भी मैं महाक्रोध ही करता रहा हूँ। इस प्रकार कहने पर वह तुम्हारी स्त्री हाथ जोड़कर कहने लगी कि स्वामी आप ऐसा क्यों कहते हो, मैंने आप पर कभी क्रोध नहीं किया। यदि मुझको कुछ दुःख प्राप्त हुआ है तो मेरे कर्मों का फल है। तुम मेरे प्रति दीनता और लज्जा मत करो। जो स्त्री अपने पति के क्रोध को सहन करे वही साध्वी है। ऐसा कहकर वह अपने पिता व भाई के घर से कुछ धन लाकर तुम्हारी सेवा करती रही। दिन-रात मल, मूत्र धोकर तुमको शुद्ध रखती व कीड़े आदि निकालती। रात दिन नींद आदि त्याग कर अपने भर्ता के दुःख से दुःखी होकर कहती हे पित्रेश्वरो! तुम मेरे पति को रोग से मुक्त करो तथा मेरे पति को पापहीन करो। तब महात्मा देवल बैशाख में गर्मी के मारे संध्या समय तुम्हारे घरे आये। उनको देख तुम्हारी स्त्री कहने लगी कि अब वैद्य मेरे घर आये, अब इनके द्वारा मेरे पति का रोग नष्ट हो जायेगा। अब तक वैद्यों ने मुझको ठग लिया। उनके चरण धोकर तुम्हारी स्त्री ने अपने सिर पर वह चरणोदक छिड़क लिया फिर महात्मा को गर्मी से व्याकुल देख शर्बत पिलाया। दूसरे दिन प्रातः वह महात्मा चले गये। उधर तुमको सन्निपात हो गया और जब तुम्हारी स्त्री ने तुमको त्रिकुटा पिलाया तो तुमने उसकी ऊंगली को काट लिया, तभी तेरे दाँत भिच गये और ऊंगली तेरे मुख में रह गई। ठीक इसी अवस्था में तुम्हारी मृत्यु हो गई और उसी वेश्या के ध्यान में तुम्हारे प्राण निकल गये। तब तुम्हारी स्त्री अपना कंगन बेचकर ईंधन लाई और तुम्हारी चिता के साथ ही वह भी सती हो गई। इस प्रकार सती होने तथा बैशाख में शर्बत पिलाने व चरणोदक सिर पर छिड़कने से वह सदगति को प्राप्त हो गई। यद्यपि तेरे सब पाप नाश हो गये थे, परन्तु अंत समय वेश्या का ध्यान करने से तूने व्याध के घर जन्म लिया। इसी कारण तू सदा हिंसा में लगा रहता है। तूने अपनी स्त्री को शर्बत पिलाने की आज्ञा दी थी, इसी कारण व्याध योनि पाकर भी धर्म पूछने की तेरी सद्बुद्धि रही। तूने भी मुनि के चरणों का जल अपने सिर पर छिड़का था इसी से तुझे सत्संगति प्राप्त हुई। तुमने अपने पूर्व जन्म में जो कर्म किये वे सब तुमको बतलाये। तेरे ये सब पाप पुण्य मैंने दिव्य दृष्टि से देखे हैं। अब तुम्हारी कोई और गुप्त इच्छा हो तो वह भी पूछ लो। तेरा चित्त शुद्ध हो गया है अतः तेरा कल्याण हो ।। .                                   ।।ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।।                                               .                                वैशाख मास महातम्य

तेईसवां अध्याय

व्याध कहने लगा कि महात्मन्! भगवान विष्णु कैसे हैं? उनको कैसे जाना जा सकता है और बैशाख धर्म क्या है, जिससे भगवान प्रसन्न होते हैं? व्याध के इस प्रकार पूछने पर मुनि कहने लगे कि सर्व शक्तिमान, निर्गुण निश्चेष्ट, विश्व सच्चिदानन्द स्वरूप और सम्पूर्ण चराचर अनन्त के स्वामी हैं। अब मैं उनके लक्षण बताता हूँ। जिससे उत्पत्ति, स्थिति, संहार, आवृति, नियम, प्रकाश, बंध और मोक्ष होते हैं। पंडित लोग उसी ब्रह्म को विष्णु कहते हैं। ब्रह्मादिक देवता सब उन्हीं के आश्रित हैं।

इतनी कथा सुनकर व्याध कहने लगा कि हे ऋषि, प्राण सर्वश्रेष्ठ क्यों माने गये? यह बात मेरी समझ में नहीं आई। तब शंख कहने लगे कि हे व्याध! प्राचीन समय में नारायण भगवान कमल योनि में ब्रह्मादिक देवताओं की रचना करके कहने लगे कि मैं ब्रह्मा को तुम्हारा राजा बनाऊँगा और जो कोई तुम में सर्वश्रेष्ठ हो उसी को तुम युवराज बनाओ। जब देवताओं ने यह बात सुनी तो आपस में युवराज बनने के लिए सब विवाद करने लगे और जब कुछ निर्णय न हुआ तो फिर भगवान् को जाकर कहने लगे भगवान! हमको तो कोई भी सर्वश्रेष्ठ दिखाई नहीं देता, इसका तो आप ही निर्णय करिये। भगवान ने हँसकर कहा कि मेरे विराट रूप में से जिसके निकलने से शरीर गिर पड़े और फिर प्रवेश करने से शरीर खड़ा हो जाये वही सर्वश्रेष्ठ है। तब जयंत भगवान के पैरों से निकल गया तो वह शरीर पंगु तो हो गया परन्तु गिरा नहीं। इसी तरह गुह्येन्द्रिय से दक्ष के निकल जाने से घंठ कहा गया, हाथों में से इन्द्र के निकल जाने से हस्तहीन कहा गया, नेत्रों में से सूर्य के निकल जाने से बहरा, जिब्या से वरुण निकल जाने से अरसक्ष और मन को चैतन्य करने वाले रुद्र के निकल जाने से तो जड़ कहाने लगा, परन्तु देह गिरी नहीं वरन् पूर्ववत् सब कार्य होते रहे। मगर फिर प्राणों के निकलते ही देह गिर गई और उसको भूत कहने लगे।

तब सब देवता आपस में विस्मय करके कहने लगे कि हम में से जो इस देह को उठाने में समर्थ होगा, वही सर्वश्रेष्ठ एवं युवराज होगा। सबसे प्रथम जयन्त ने पैरों में प्रवेश किया तो पंगुपन तो हट गया परन्तु शरीर उठा नहीं। दक्ष गुह्येन्द्रिय द्वारा प्रविष्ट हुआ, इन्द्र हाथों द्वारा, सूर्य नेत्रों द्वारा, अग्नि वाणी द्वारा, रुद्र मन के द्वारा प्रविष्ट होने पर भी देह उठी नहीं। सबसे अन्तिम प्राणों के प्रविष्ट होते ही शरीर उठकर खड़ा हो गया। इसी कारण प्राण सर्वश्रेष्ठ और युवराज बनाया गया। तब प्राण के सम्मान के लिए सब सामवेद का गान करने लगे। इसीलिए स्थावर और जंगमात्मक के लिए यह सृष्टि प्राणात्मक है। प्राण ही जगत्पति हैं, प्राण बिना जगत् कुछ भी नहीं ।।
वैशाख मास महातम्य

चौबीसवां अध्याय

व्याध कहने लगा कि हे ब्रह्मन्! परमात्मा मे यह करोड़ों जीव उत्पन्न किये? इनके भिन्न भिन्न कर्म अनेकों सनातन मार्ग हैं और इनके स्वभाव एक से क्यों नहीं? यह सब मेरी जानने की इच्छा है। शंख मुनि कहने लगे कि सत्वगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी तीन प्रकार के मनुष्य होते हैं। इन गुणों की विषमता, न्यूनता और अधिकता से मनुष्य वैसे ही कर्म करता है। और उन्हीं के फल भोगने से मनुष्य कभी सुखों और कभी दुःखों को प्राप्त होता है। प्रकृति के जीव इन्हीं तीनों गुणों से बंधे हुए हैं। गुण कर्म के अनुसार ही कर्म का नाश और फल होता है। तमोगुणी पुरुष सदैव निष्ठुर, निर्दयी और सबसे द्वेष रखने के कारण सदा दुःखी रहते हैं। राक्षसों से लेकर पिशाचों तक सब तामसी गति को प्राप्त होते हैं। रजोगुणियों की बुद्धि पाप और पुण्य मिली हुई होती है। वे पाप और पुण्य दोनों करते हैं, इस कारण स्वर्ग और नरक दोनों में जाते हैं तथा सुख व दुःख दोनों ही भोगते हैं और यह मंदभोगी सदैव संसार में जन्म लेते हैं । सत्वगुणी, धर्मात्मा, दया वाले, पराई निन्दा न करने वाले तथा श्रद्धावान् होते हैं। यह सत्वगुणी वृत्ति वाले महा तेजस्वी, पाप रहित ऊपर के लोकों को जाते हैं। वह अपने गुण और कर्मों के अनुसार कर्म करते हुए भगवान के समीप पहुंच जाते है ।।
  || ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

वैशाख मास महातम्य

पच्चीसवां अध्याय :- तब व्याध कहने लगा कि हे मुने! पूर्ण भोग वाले मनुष्य की मुक्ति कब होती है, सृष्टिकाल में या अन्तकाल अथवा स्थिति काल में? सृष्टि की स्थिति तथा संसार काल की मर्यादा कितनी है? शंख बोले, चार सहस्त्र युगों का ब्रह्मा का एक दिन और इतनी ही रात्रि होती है। इस प्रकार दिन रात मिलकर ब्रह्मा का एक अहोरात्र होता है। पन्द्रह अहोरात्र एक पक्ष और दो पक्षों का एक मास होता है। दो मास की एक ऋतु, तीन ऋतुओं का एक अयन और दो अयन का एक वर्ष होता है। इसी प्रकार ब्रह्मा जी के सौ वर्षों का एक ब्रह्मकल्प होता है । इसी को वेद के जानने वाले प्रलय का समय कहते हैं। प्रलय तीन प्रकार की होती है। एक ‘मानव प्रलय’ जिसमें मनुष्यों का अन्त होता है, दूसरी ‘दैनन्दिनी प्रलय’ और तीसरी ‘ब्रह्म प्रलय’ । ब्रह्मा जी के एक मुहूर्त में एक मनु की प्रलय होती है। इसी प्रकार जब चौदह मनु हो जाते हैं तब एक दैनन्दिनी प्रलय होती है। मन्वन्तर प्रलय में पृथ्वी, आकाश और पाताल तीनों लोकों का प्रलय हो जाता है, परन्तु इस मन्वन्तर प्रलय में चैतन्य जीवों का ही नाश होता है किन्तु लोकों के स्वरूप का नाश नहीं होता, केवल उन लोकों में जल प्लावन हो जाता है । फिर मन्वन्तर के अन्त में चैतन्य जीवों की पुनः उत्पत्ति हो जाती है लेकिन दैनन्दिनी-प्रलय में लोक और लोकस्थ सबका नाश हो जाता है, सिर्फ एक सत्य लोक ही रह जाता है। ब्रह्मा जी के शयन करने पर चैतन्य अधिभूतों सहित सबका नाश हो जाता है कोई-कोई तत्वाभिमानी देवता और मुनि बचे रहते हैं तथा सत्य लोक के शयन करने वाले भी रह जाते हैं जो कल्प भर तक सोते रहते हैं। फिर रात्रि के समाप्त होने पर ब्रह्मा जी पुनः सृष्टि की रचना करते हैं जिसमें देवता, ऋषि और पितृ लोक व वर्ण धर्मों सहित सबकी अलग-अलग रचना होती है। भगवान विष्णु नियम पूर्वक दस अवतार धारण करते हैं और अन्यान्य देवता ऋषि कल्प के पश्चात् ब्रह्मा जी के द्वारा फिर सो जाते हैं। जो ब्रह्मा जी के साथ ही मुक्ति पाने वाले हैं वे सब राजा, साधु और सिद्ध ब्रह्मलोक में रहने वाले हैं। वे सत्यलोक में ही रहते हैं, यहां नहीं आते तथा जो उस राशि पर जाने वाले उसी नाम से श्रुति में तथा रीति में स्थित हैं वे फिर जाते हैं। अपने अपने कर्म कर्ता अपने-अपने गोत्रों में जन्म लेते हैं। जब कलियुग समाप्त हो जाता है और सब दैत्यों का नाश हो जाता है तब वे भी कलियुग सहित अपनी गति को जाते हैं। वे अपने कर्मानुसार वैसे ही कर्म करने वाले होते हैं। शंख कहने लगा कि हे व्याध अब मैं तेरे सामने सृष्टिकाल और मुक्ति काल का वर्णन करता हूँ। भगवान का एक निमेष (आँख झपकना) ब्रह्मा जी के एक कल्प के बराबर होता है उतना ही समय पलक का खुलना। निमेष के अन्त में उन्हें अपने कुक्षिस्थ लोकों की रचना की इच्छा होती है। तब सब लोकों और सब जीव समूहों को अपने उदर में रखता है। उनमें से कितने ही सृजन योग्य कितने ही मुक्ति और कितने ही ऐसे होते हैं जिनका लिंग देह छूट गया है। श्रुतिदेव जी कहते हैं कि जब यह कथा शंख, व्याध को सुना रहे थे तब सबके देखते-देखते वह पंच शाखी वृक्ष पृथ्वी पर गिर पड़ा और उसके कोटर से एक बड़ा भयंकर सर्प तत्काल पापरूपी देह को त्याग कर हाथ जोड़ सिर झुका कर वहीं बैठ गया।।    || ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

वैशाख मास महातम्य

छब्बीसवां अध्याय

श्रुतिदेव कहने लगे कि शंख ऋषि और व्याध उसको इस प्रकार देखकर बड़े विस्मय से पूछने लगे कि तुम कौन हो और किस पाप से तुम इस योनि को प्राप्त हुए और अब किस शुभ कर्म से तुम्हारी बुद्धि शुद्ध हुई और अकस्मात तेरी मुक्ति हो गई? शंख के इस प्रकार पूछने पर वह पृथ्वी पर दंडवत गिरकर सिर झुका और हाथ जोड़कर कहने लगा कि मैं कुसिद मुनि का पुत्र रोचन नाम वाला प्रयागराज का ब्राह्मण था। आसन, शयन, निद्रा, लोकचर्या, ब्याज लेना यही मेरा काम था। मेरी किसी के प्रति श्रद्धा नहीं थी। इसी तरह मेरा बहुत सा समय व्यतीत हो गया। एक समय भगवान के प्रिय बैशाख मास में जयंत नाम का एक ब्राह्मण वहां आया और उस क्षेत्र के रहने वाले बहुत से हजारों स्त्री पुरुष उससे बैशाख मास की कथा सुनने लगे। सब लोग प्रातः समय स्नान कर मन लगा कर उसकी कथा सुनते थे। मैं केवल कौतुक देखने के लिए उस सभा में जाया करता था। मैं सिर पर पगड़ी बांध, पान चबाकर बड़े दंभ से वहां जाकर लोगों से इधर-उधर की बातें करता और उनका मन कथा से हटाता था, उसी दोष के कारण मेरी बुद्धि नष्ट हो गई, अवस्था क्षीण हो गई और सन्निपात से मेरे प्राण निकल गए। यमदूत मुझको पकड़ कर बड़े भयंकर नरक में ले गए और मैं वहां चौदह मन्वन्तर तक अनेकों दुःखों को भोगता रहा। उसके पश्चात् चौरासी लाख योनि भोगकर इस रूप में वृक्ष के कोटर में बैठा हूँ। दैवयोग से आपके मुख से निकली हुई कथा को सुनकर मेरे सब पाप नष्ट हो गये और सर्प की योनि छोड़ तथा दिव्य देह धारण कर आपकी शरण में आया हूँ। मैं नहीं जानता कि आप मेरे कौन से जन्म के बन्धु हैं मैंने तो कभी किसी का कोई उपकार नहीं किया, फिर सज्जनों का संग कैसे हुआ। आप मुझ पर कृपा करिए। शंख मुनि ने बड़े प्रेम से उसको उठाया और उनके स्पर्श मात्र से उसके पाप नष्ट हो गए। फिर उस दिव्य रूपधारी ब्राह्मण पर कृपा करके सब वृत्तान्त कहने लगे कि हे ब्राह्मण! जैशाख मास और भगवान विष्णु का महात्म्य सुनने मात्र से तेरे सब पाप नष्ट हो गए। तू क्रम से अतिवाहिक लोकों को जाकर फिर दर्पण देश के ब्राह्मण के घर जन्म लेगा और वेदशर्मा नाम से प्रसिद्ध होकर सब विद्याओं में निपुण होगा। प्रत्येक जन्म में तुझे जाति स्मृति रहेगी और तुम सम्पूर्ण इच्छाओं को त्याग कर बैशाखोक्त विष्णु के प्रिय धर्म को करोगे। निस्पृह गुरु भक्त और जितेन्द्रिय होकर उस जन्म से सदैव भगवान की कथा सुनने में तत्पर रहोगे और इस प्रकार तुम सिद्धि को प्राप्त हो जाओगे और सब बन्धनों से मुक्त होकर योगियों को भी दुर्लभ मोक्षपद को प्राप्त करोगे। डरो मत मेरी कृपा से तुम्हारा कल्याण होगा। जो किसी प्रकार श्रद्धाहीन होकर भी भगवान के नाम का स्मरण करता है वह भी निर्मल होकर मुक्त हो जाता है तो जो श्रद्धा पूर्वक जितेन्द्रिय होकर सुनते हैं फिर उनका कहना ही क्या है। जो कोई भक्ति से अथवा द्वेष से भी कथा आदि करते या सुनते हैं अथवा भगवान की उपासना करते हैं वे सभी मुक्त हो जाते हैं। भगवान के भिन्न यश से अंकित जो अनेक नाम हैं उन्हें साधु महात्मा सुनते, गान करते और मनन करते हैं ऐसी भगवान की सेवा में न कष्ट उठाना पड़ता है न धन खर्च होता है। जिनके स्मरण मात्र से प्रकाशमय धाम मिलता है। उस दयालु परमात्मा की शरण में हम जाते हैं। तुम भी उस नारायण की शरण में जाओ। बैशाखोक्त धर्म के कार्यों को करो, इसी से भगवान तुम पर प्रसन्न होंगे। ऐसा कहकर मुनीश्वर चुप हो गये। तब व्याध को देखकर वह दिव्य पुरुष मुनीश्वर से कहने लगा कि महाराज मैं धन्य हूँ। आपकी कृपा से मेरे पूर्ण भाग्योदय हो गए। आपने मुझ पर बड़ी कृपा की जिससे मेरी यह दुष्ट योनि चली गई। ऐसा कहकर वह परिक्रमा कर आज्ञा ले स्वर्ग लोक को चला गया। जब संध्या हो गई तो शंख मुनि भगवान के अनेक अवतारों और इतिहास की कथा सुनाते रहे। प्रातःकाल में ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शौचादि क्रिया से निवृत्त होकर सूर्योदय से पहले ही स्नान कर संध्या वंदन और तर्पण आदि करके व्याध को बुला उसके सिर पर प्रोक्षण कर वेद से भी अधिक शुभदायक फल देने वाला “राम” दो अक्षर का मंत्र जपने के लिए बताया। शंख कहने लगे कि हे व्याध! विष्णु का नाम अनेक पापों को दूर करने वाला है इससे हे व्याध! तुम निरन्तर राम नाम का जाप करते रहा करो। राम नाम का निरन्तर जाप करने और बैशाखोक्त धर्म का पालन करने से तुम्हारा जन्म बाल्मीकि ऋषि के कुल में होगा और तुम बाल्मीकि नाम से प्रसिद्ध होगे। इस प्रकार यह सब बातें व्याध को बताकर शंख मुनि दक्षिण दिशा को चले गये और व्याध कुछ दूर उनके पीछे जाकर हाय हाय करके वियोग में रोने लगा। जब तक नेत्रों से ओझल न हुए उन्हीं की तरफ देखता रहा फिर उठकर वन को स्वच्छ कर उस मार्ग पर प्याऊ लगाकर बैशाखोक्त धर्मों का पालन करने लगा। वन के केथ, पनस, जामुन आदि फलों को इकट्ठा करके श्रम के थके पथिकों को भोजन कराता, जूते, चंदन, छत्री, पंखा आदि से पथिकों की सेवा करता, उनको बालू का बिछौना बिछाता तथा रात दिन राम नाम का जाप करने लगा। इस प्रकार जन्म बिताकर बाल्मीकि ऋषि के घर जन्म लिया। उसी सरोवर के किनारे कृणु नाम के ऋषि दुस्तर तप करते थे उनके शरीर पर बहुत दिन तक समाधि लगाने से दीमक की बांबी बन गई थी, इसीकारण उनको बाल्मीकि ऋषि कहने लगे। तप के अंत में स्त्रियों के गाने के शब्द सुनकर उनका मन चलायमान हो गया और एक भील जाति की स्त्री से उनके बाल्मीकि नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। यह बाल्मीकि बड़े ही तपस्वी और यशस्वी हुए, जिन्होंने मनोहर छंदों में संसार के सब बंधनों को काटने वाली राम कथा कही। श्रुतिदेव जी कहने लगे कि बैशाखोक्त थोड़े से धर्म अर्थात् जूते दान करने से ही व्याध को कितना दुर्लभ ऋषित्व प्राप्त हुआ। जो कोई इस पापनाशक कथा को सुनेगा, उसका फिर जन्म संसार में नही होगा ।।।ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।।              

वैशाख मास महातम्य : सत्ताईसवां अध्याय!!

मैथिल कहने लगे कि बैशाख मास में कौन-कौन सी तिथियां अत्यन्त पुण्यकारक हैं, उनमें क्या-क्या दान करना चाहिए और किसने इनको प्रख्यात किया । तब श्रुतिदेव जी कहने लगे कि बैशाख मास की सब ही तिथियां अत्यन्त उत्तम हैं। प्रत्येक तिथियों में किया गया दान कई गुना फल देने वाला है। सम्पूर्ण तीर्थ करने से जो फल प्राप्त होता है वैसा ही फल एक-एक तिथि में स्नान, दान, तप, होम, पूजनादि से प्राप्त होता है। कथा श्रवण करने से तत्काल मुक्ति मिलती है। रोगी तथा पीड़ित भी इस कथा के श्रवण से कृतकृत्य हो जाते हैं। जो कोई बिना स्नान, दान इन दिनों को व्यतीत करता है उसको गोवध, कृतघ्न, पितृ-घाती तथा आत्मघात का पाप लगता है। जल स्वाधीन है तथा शरीर भी स्वाधीन है फिर स्नान में संकोच क्यों किया जाये? दरिद्री, धनवान्, लंगड़ा, लूला, अंधा, नपुंसक, विधवा स्त्री, बालक, वृद्ध, युवा सभी को बैशाख मास का सेवन करना चाहिए। बैशाखोक्त धर्म सुख से साधने के योग्य है। जिससे अधिक और कुछ शुभ नहीं है। जो कोई नीच इन सुलभ धर्मों का पालन नहीं करता उनको नरक का भागी होना पड़ता है इसमें कोई सन्देह नहीं। जैसे दही को मथकर मक्खन निकाला जाता है वैसे ही इस मास की तिथियों को अलग-अलग बताता हूँ। चैत्र के महीने से जब मेष की संक्रान्ति हो तब पापों के नाश करने वाली अमावस्या को कई गया जी करने का फल मिलता है। मैं नरक और पितरों का एक पुराना इतिहास कहता हूँ। जब पृथ्वी में सावर्णि मन्वन्तर का राज्य था। तीसवें कलियुग के अन्त में जब सारे धर्म नष्ट हो गये उस समय आनर्त देश में धर्मवर्ण नाम का एक ब्राह्मण हुआ। उसने इस घोर कलियुग में मनुष्यों को पापों में रत देखा। सब मनुष्य अपने वर्ण धर्मों से हीन हो गए। तब एक दिन वह ब्राह्मण महात्माओं के सत्रयज्ञ देखने के लिए पुष्कर क्षेत्र गया। वहां पर ऋषि मुनि शास्त्रानुकूल पुण्य कथाओं का वर्णन कर रहे थे। कोई कोई कलियुग की प्रशंसा भी कर रहे थे। कहते थे कि सतयुग में भगवान एक वर्ष भर की तपस्या से प्रसन्न होते थे, तो त्रेता में एक मास और द्वापर में एक पक्ष में, परन्तु कलियुग में उससे दस गुना फल भगवान् के स्मरण मात्र से ही हो जाता है। कलियुग में थोड़ा सा पुण्य कर्म भी अधिक फल देता है। जो दया, पुण्य, दान, धर्मादिक कुछ भी नहीं कर सकते उनके लिए केवल हरिनाम उच्चारण करना ही अत्युत्तम है। जो अकाल में अन्नदान करते हैं वे बैकुण्ठ को जाते हैं। वहां पर जब यह प्रसंग हो ही रहा था तो नारद ऋषि एक हाथ से शिश और दूसरे हाथ से जिह्वा को पकड़ कर उन्मत्त की तरह खूब हँसने व नाचने लगे। सबने आश्चर्य से पूछा कि नारद जी इसका क्या कारण है? नारद जी ने उसी अवस्था में उत्तर दिया कि निस्संदेह कलियुग प्रशंसनीय है। क्योंकि इसमें केशव भगवान स्मरण मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं तब भी मैं तुमसे कहता हूँ कि शिश (इन्द्रिय) और जिह्वा को वश में करना अति कठिन है। जिसने इन दोनों को वश में कर लिया वह साक्षात जनार्दन के ही तुल्य है। अतः इस कलियुग के आगमन पर तुम्हारा यहां ठहरना ठीक नहीं सो पाखण्डमय भूमि को त्याग कर अन्यत्र कहीं जाकर विचरना चाहिए। वह सब मुनि ऐसे वचन सुनकर यज्ञ समाप्त कर कहीं अन्यत्र पर्वतों पर चले गए। धर्म वर्ण भी यह मन नैष्ठिक ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर, छाल के वस्त्र पहन, कमंडलु हाथ में ले जटा बढ़ाकर कलियुग के अनाचारों को देखने लगे कि सम्पूर्ण मनुष्य जाति घोर पापों में लगी हुई है। ब्राह्मण, संन्यासी तथा शूद्र सभी पाखण्डी हो गए हैं। पत्नी पति से विरोध करती है। पुत्र पिता से, सेवक स्वामी से और गुरु शिष्य से द्वेष कर रहे हैं। सब ब्राह्मण शूद्रवत हो गए हैं। वेद कहानी मात्र रह गए हैं। वेद विरुद्ध कर्म करना साधारण बात हो गई है। भूत, पिशाच, प्रेतादि की पूजा सब करते हैं । सम्पूर्ण मनुष्य कुकर्मों में लगे हुए हैं। कुकर्मों में प्राण तक त्याग देते हैं। झूठी गवाही देते हैं, मन में कपट रखते हैं।।         || ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

वैशाख मास महातम्य : अट्ठाईसवां अध्याय

प्राचीन समय में राजा बलि और इन्द्र का घोर युद्ध हुआ । इन्द्र बलि को जीत कर फिर धरती पर उतथ्य ऋषि के आश्रम में गया। वहां जाकर उसकी मंदगामिनी गर्भिणी पत्नी को सोते हुए देखकर इन्द्र काम के वशीभूत होकर बल् पूर्वक उसके साथ भोग करने लगा। तब गर्भस्थ बालक ने अपने पैरों से योनि मार्ग को ढक दिया जिससे इन्द्र का वीर्य पृथ्वी पर गिर गया। इस पर इन्द्र ने क्रोधित होकर शिशु को श्राप दिया कि तू इस कर्म के करने से जन्मांध होगा। फिर ऋषि के श्राप से डरकर इन्द्र वहां से भागा उसको इस प्रकार भागते हुए देख कर ऋषि शिष्य हँसने लगा। तब वह लज्जा के मारे मेरु पर्वत की कंदरा में जाकर छुप गया और वहां बैठकर तप करने लगा। जब इन्द्र कंदरा में छुप गया तो राजा बलि ने अपने गुप्तचरों द्वारा सब बातें जानकर स्वर्ग पर आक्रमण करके अमरावती पुरी को घेर लिया और देवताओं तथा दिक्पालों की सब विभूति को अपने अधिकार में ले लिया और देवताओं का सब राज्य भोगने लगे। तब अग्नि आदि सब देवता दैत्यों से दुःखी होकर बृहस्पति जी के पास गये और उनको सब वृत्तान्त सुनाया और कहा कि राजा बिना हम सब देवता अनाथ हो गए हैं सो आप विचारिए कि स्वर्ग के राजा इन्द्र कहाँ गए और कब आयेंगे। तब देवगुरु बृहस्पति जी ने इन्द्र का रसातल में बलि को जीतकर उतथ्य के आश्रम में जाना और ऋषि पत्नी के साथ बल पूर्वक भोग करना एवं शिष्यों से अपमानित होकर कंदरा में छुप जाने का समस्त वृत्तान्त देवताओं को सुनाया और कहा कि अब इन्द्र शचिक सहित वहीं गुफा में घुसा हुआ है और अपने किए हुए कर्म पर पश्चाताप कर रहा है। तब सब देवता उसी कंदरा में पहुंचे और उसमें बैठे हुए इन्द्र को देखकर सब उसके बल और वीर्य की प्रशंसा विख्यात स्तोत्रों द्वारा उसे प्रसन्न करने के लिए करने लगे। सब देवता कहने लगे कि हे देवताओं के स्वामी! आपके बिना दैत्यों ने हमको बड़ा क्लेश दिया है। हम स्थानभ्रष्ट होकर फिर रहे हैं। अब आप चलकर शत्रुओं का दमन करो। इन्द्र कहने लगा- पर स्त्रीगमन के दोष से मेरा बल, वीर्य, यश, मंत्र शक्ति, विद्या शक्ति सब नष्ट हो गई हैं, इसी कारण मैं यहां गुप्त निवास कर रहा हूँ। इन्द्र की यह बात सुनकर सबने इन्द्र को बल देने का विचार किया। बृहस्पति जी ने कहा कि हे इन्द्र ! अक्षय तृतीया को जिसमें स्नान दानादि से मनुष्यों के हजारों पाप नष्ट हो जाते हैं और बल, वीर्य तथा ऐश्वर्य बढ़ता है इससे तुम इस दिन स्नानादि करो। बृहस्पति जी के ऐसे वचन सुनकर इन्द्र ने अक्षय तृतीया को स्नान दानादि बैशाखोक्त धर्म किया, एवं इस भक्ति तथा मुक्ति देने वाले धर्म कार्य से उनके बल, वीर्यादि सब पूर्ववत् बढ़ गये तथा पर-स्त्रीगमन दोष भी नष्ट हो गया। तब वह पूर्ववत् देवताओं से शोभा को प्राप्त हुआ और दैत्यों को जीत उनसे अपना अधिकार प्राप्त कर अमरावती में प्रवेश किया। तभी से वह अक्षय तृतीया जगत् में प्रख्यात है।

वैशाख मास महातम्य

उनतीसवां अध्याय

प्राचीन समय में काश्मीर देश में देवव्रत नाम का एक ब्राह्मण था उनकी मालिनी नाम की एक पुत्री हुई। वह कन्या सत्यशील विद्वान ब्राह्मण को ब्याही गई। वह उसके साथ विवाह करके अपने साथ यवन देश में ले गया। वह मालिनी अत्यन्त दुष्टा थी। वह रूप यौवन वाली कभी भी अपने पति की प्रिय नहीं थी। वह निष्ठुर सदैव अपने पति से द्वेष रखती थी। अपने पति को वश में रखने के लिए उसने दूसरी स्त्रियों से वशीकरण मंत्र पूछा जिनके पतियों ने उनको त्याग दिया था उन्होंने कहा हमने तो अपने पति को वशीकरण औषधि से वश में कर लिया है तू भी योगिनी के पास जा, वह तुमको दिव्य वशीकरण औषधि देगी जिससे हमको विश्वास है तेरा पति अवश्य तेरे वश में हो जायेगा। उनके कथनानुसार वह योगिनी के मंदिर में गई जहां पर कुटी में सौ स्तम्भ बने हुए थे। इस प्रकार उस मालिनी ने वहाँ पहुँच मन को क्षोभ कराने वाले मंत्रों के लिए प्रार्थना की। फिर उसने ही जड़ी हुई स्वर्ण की अंगूठी योगिनी को भेंट की। योगिनी पति के अपमान से दुखित हृदय जानकर कहने लगी कि यह रक्षा चूर्ण तुमको देती हूं यह सम्पूर्ण प्राणियों को वश में करने वाला है। यह चूर्ण अपने पति को देकर उसकी ग्रीवा की रक्षा करना तेरा पति तेरे वश में हो जायेगा। तेरे बुरे चरित्रों को देखकर भी तुझको कुछ न कहेगा। वह उस चूर्ण को लेकर घर आई और सन्ध्या समय दूध में मिलाकर अपने पति को पिला दिया। उस चूर्ण को पीने से उसको क्षय रोग हो गया और वह दिनों दिन क्षयी होता चला गया तथा उसके गुह्य स्थान में घाव होकर कीड़े पड़ गये। जब उसके पति की ऐसी दशा हो गई तो वह इच्छापूर्वक विचरने लगी। तब उसका पति पीड़ा के मारे त्राहि-त्राहि पुकारने लगा और – कहने लगा कि मैं तेरी शरण में हूँ तू मेरी रक्षा कर  मैं कभी पर-स्त्री की इच्छा नहीं करता, तेरा दास हूँ मेरी रक्षा कर। अपने पति की ऐसी दशा देखकर वह बहुत घबराई और सोचने लगी कि यदि यह मर गया तो मैं सब श्रृंगारों से विहीन हो जाऊँगी। ऐसा सोचकर वह फिर योगिनी के पास गई और उससे सब वृत्तान्त कहा तब उसने पहली औषधि का दाह शांत करने के लिए दूसरी औषधि दी और पान करते ही उसका पति स्वस्थ हो गया। तब से उसका पति घर में ही रहता और उसके वशीभूत हो गया। घर के काम के बहाने और कई व्यभिचारी तथा कामी उसके घर आते रहते परन्तु उसको अपनी स्त्री के आगे कुछ भी कहने की शक्ति नहीं थी। इसी पाप के कारण उसके शरीर में कीड़े पड़ गये और उस मालिनी के कान, आंख और जिह्वा में छेद हो गये। उसके स्तन कट गये, उंगलियां गलने लगीं, पैरों से लूली हो गई और ऐसे कष्ट भोगकर वह कुछ दिनों पश्चात् दुःखी होकर मर गई। पन्द्रह हजार वर्ष की ताम्रभांड नामक नरक में दग्ध होती रही। फिर सौ जन्म तक कुत्ते की योनि में पड़ती रही। दैवयोग से जब कर्म फल पूरा हो गया तो बैशाख मास में संक्रान्ति में शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन पदमबंधु का पुत्र नदी में स्नान कर पवित्र हो गीले वस्त्रों से ही घर आया। वहां पर तुलसी वृक्ष के पास उसने पैर धोये, उसी स्तम्भ के नीचे वह कुतिया सो रही थी। सूर्य उदय से पहिले वह कुतिया उस चरण धोये जल में लेट गई जिससे उसके पाप तत्काल नष्ट हो गये और पूर्व जन्म के सब पाप कर्मों की याद हो गई। अपने पिछले जन्मों के पाप कर्मों को याद कर व्याकुल होकर त्राहि-त्राहि पुकारने लगी और भय से व्याकुल हो अपने पूर्व कर्मों का वर्णन कर उस मुनि से कहने लगी कि मुने! बैशाख शुक्ल पक्ष में पुण्यों के बढ़ाने वाली द्वादशी के दिन स्नान दानादि का जो सुकृत आपने किया है वह मुझे दे दो इस सुकृत से मेरी मुक्ति हो जायेगी। इस तिथि को आपने जो महा पुण्य किया है वह मुझको देकर उद्धार करो, मैं अत्यन्त दीन हूँ मेरी रक्षा करो, हे द्विजवर में आपको नमस्कार करती हूँ। ऐसे वचन सुनकर वह मुनिपुत्र कुतिया से बोले कि अपने किये हुए अच्छे और बुरे कर्मों का फल मनुष्य सुख और दुःख के रूप में अवश्य भोगता है। ऐसे वचन सुनकर कुतिया दुःखी होकर ऊँचा मुख करके जोर-जोर से पुकारने लगी और उसके पिता पद्मबंधु से कहने लगी- मैं आपके द्वार पर पड़ी रहने वाली कुतिया हूँ, आपका जूठा टुकड़ा खाती रहती हूँ, आप मेरी रक्षा करिये। क्योंकि महात्मा गृहस्थियों को जो उनके द्वार पर उनकी शरण में पड़े रहते हैं उनका उद्धार करना परम कर्तव्य है, अतः आप मुझ मूर्खा का उद्धार करो। ऐसे कुतिया के वचन सुनकर पद्मबंधु घर के बाहर आया और पूछने लगा कि क्या बात है? तब उसके पुत्र ने सब कथा वर्णन की। पुत्र के वचन सुनकर वे विस्मय के साथ कहने लगे कि मेरा पुत्र होकर तूने यह क्या कहा, साधुओं को ऐसे वचन कहने उचित नहीं हैं, सम्पूर्ण प्राणी परोपकार के लिए ही हैं। अपनी आत्मा को सुख देने वाले पापी होते हैं। चन्द्रमा, सूर्य, पवन, पृथ्वी, अग्नि, जल, चंदन, वृक्ष और महात्मा सभी परोपकार में लगे रहते हैं। दधीचि ऋषि ने दैत्यों को अति बलवान जानकर अपनी हड्डियां निकालकर देवताओं को दे दी थीं। जब भूखे श्येन ने कबूतर को पकड़ लिया तो राजा शिवि ने अपना मांस काटकर श्येन को दिया था। जीमूत नामी राजा ने गरुड़ के लिए अपने प्राण दे दिए थे। इसलिए विद्वान ब्राह्मण को तो सब पर ही दया करनी चाहिए जैसे कीचड़ में फंसी हुई गौ बाहर निकलते हैं उसी प्रकार मैं भी बार-बार प्रार्थना करती हुई इस कुतिया के दुःख को अपने पुण्य के प्रभाव से अवश्य दूर करूँगा। इस प्रकार अपने पुत्र को समझाकर कुतिया से कहने लगा कि मैं तेरे निमित्त प्रतिज्ञा करता हूँ कि तू मेरे द्वादशी के पुण्य से पापों से छूट कर विष्णु लोक को जा । श्रुतिदेव जी कहते हैं कि राजन वह कुतिया अपने शरीर को त्याग कर दिव्य वस्त्र आभूषण पहन, सूर्य के समान तेज वाली तथा सावित्री के समान हो ब्राह्मण से आज्ञा मांग चारों दिशाओं को प्रकाशित करती हुई स्वर्ग में जाकर भोगों को भोगती हुई, बैशाख शुक्ल द्वादशी के प्रभाव से, उर्वशी नाम की अप्सरा श्रेष्ठ अंगों वाली तथा देवताओं की प्रिय हुई।

वैशाख मास महातम्य : तीसवां अध्याय

श्रुतिदेव जी कहते हैं कि हे राजन! बैशाख शुक्ला की अन्तिम तीन तिथियां – त्रयोदशी. चतुर्दशी और पूर्णमासी बहुत ही शुभ फल देने वाली हैं। तीन तिथियां पुष्करणी कहलाती हैं । जो यदि बैशाख में महीना भर तक स्नान न कर सके तो इन तीन दिन तक स्नान करने से पूर्ण फल मिल जाता है। त्रयोदशी को सम्पूर्ण देवता इकट्ठे होकर जीवों को पवित्र करते हैं। पूर्णमासी के दिन सम्पूर्ण तीर्थ विष्णु भगवान के संग इकट्ठे होते हैं। कोई ऐसा ही पापी चाहे ब्रह्मघाती या मद्यपान करता हो ये सबको पवित्र कर देते हैं। प्राचीन समय में एकादशी के दिन भगवान ने अमृत उत्पन्न किया था, द्वादशी के दिन उसकी रक्षा की, त्रयोदशी के दिन देवताओं को अमृत पिलाया। चतुर्दशी के दिन दैत्यों का नाश किया और पूर्णमासी के दिन देवताओं ने राज्य प्राप्त किया। इसी कारण देवताओं ने प्रसन्न चित्त से इन तीनों तिथियों को वरदान दिया। बैशाख मास की यह तीनों तिथियां अति शुभ, पुत्र पौत्रादि देने वाली तथा पाप नाश करने वाली हैं । जो सारे बैशाख मास में स्नान नहीं कर सका वह इन तीन तिथियों में स्नान करके पूर्ण फल प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार यह सम्पूर्ण बैशाख का महात्म्य बुद्धिमान श्रुतिकीर्ति के आगे कहा हुआ जैसा सुना देखा है वर्णन किया है। श्री विष्णु भगवान जगन्नाथ श्री नारायण के बिना इस कथा को कौन कह सकता है। सब ऋषियों ने मनुष्यों के हित की कामना के लिए थोड़ा-थोड़ा इस महात्म्य का वर्णन किया है परन्तु किसी ने भी इस का अन्त नहीं पाया। सो हे राजन! तुम वैशाख मास में दानादि सत्कर्म करो इससे तुमको निश्चय पूर्वक मुक्ति मिलेगी। श्रुतिदेव जी इतनी कथा राजा मिथिलेश से कहकर समझाकर जाने का विचार करने लगे तो राजा के हृदय में अति दुःख उत्पन्न हुआ। फिर बड़े उत्सव के साथ श्रुतिदेव जी को पालकी में बैठा सारे नगर की परिक्रमा कराकर अंतःपुर में लाया और वस्त्र, आभूषण, गौ, पृथ्वी, तिल, स्वर्ण तथा और सब प्रकार के वैभव सामने रखकर हाथ जोड़ सन्मुख खड़ा हो गया। तब महा तेजस्वी श्रुतिदेव जी अत्यन्त संतुष्ट होकर अपने धाम को गये। नारद जी कहने लगे कि हे राजा अम्बरीष! यह परम अद्भुत कथा मैंने तुमको सुनाई जिसके सुनने मात्र से सब पाप नष्ट हो जाते हैं इससे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पदार्थ मिलते हैं। तब नारद जी के ऐसे वचन सुन महा यशस्वी अम्बरीष अत्यन्त प्रसन्न हुआ और नारद जी को प्रणाम कर विधिवत् उनका पूजन किया। नारद जी राजा की आज्ञा लेकर चले गये क्योंकि वह श्रापवश एक जगह ठहर नहीं सकते थे। सूत जी कहने लगे जो पापों के नाश करने वाली तथा पुण्य को बढ़ाने वाली इस परम अद्भुत कथा को पढ़ता या सुनता है वह परम गति को प्राप्त होता है ।॥ इति बैशाख महात्म्य समाप्तम्।।

।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।।

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